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यहां नियमों की अवहेलना करने वाले 40 स्कूलों की मान्यता खतरे में

23 दिन की और मोहलत दी गई

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23 दिन की और मोहलत दी गई

23 दिन की और मोहलत दी गई

जांजगीर-चांपा. आरटीई यानी शिक्षा के अधिकार अधिनियम के नियम एवं शर्तों को पूरा नहीं करने वाले जिले के 40 स्कूलों की मान्यता खतरे में है।

गुरुवार शाम छह बजे तक ऐसे 40 स्कूल यदि आरटीई के तहत पंजीयन नहीं कराते तो उनकी मान्यता समाप्त कर दी जाएगी। जबकि इन स्कूलों को 10 अप्रैल तक का समय दिया गया था। इसके बाद 23 दिन की और मोहलत दी गई थी। इसके बाद भी स्कूल संचालक नहीं जागे तब स्कूल शिक्षा विभाग को कड़ा रुख अपनाना पड़ा। फिलहाल निजी स्कूल संचालक डीईओ दफ्तर के चक्कर काट रहे हैं। ताकि उनके स्कूलों की मान्यता बच जाए, लेकिन विभागीय अफसर बेबस नजर आ रहे हैं।


जिले के निजी स्कूल संचालक मलाई खाने के फेर में इतने मसगूल है कि उनके पास आरटीई के नियमों का पालन करने का भी समय नहीं है। इसे शिक्षा विभाग ने गंभीरता से लिया है। दरअसल इन दिनों स्कूल शिक्षा विभाग शिक्षा के अधिकार के तहत मान्यता की शर्तों का पालन कराने के लिए कड़े नियम बनाए हैं। खास तौर पर आईटीई के तहत गरीब छात्रों का निजी स्कूलों में एडमिशन के लिए पारदर्शिता भी बरती जा रही है। ताकि कोई भी निजी स्कूल संचालक इस अधिनियम का मखौल न उड़ाए। इसके बाद भी निजी स्कूल संचालक मनमानी कर रहे हैं।


हाल ही में स्कूल शिक्षा विभाग ने निजी स्कूल संचालकों से साफ कहा था कि आरटीई के तहत भर्ती के लिए वे अपने स्कूलों के रिक्त सीटों की जानकारी उपलब्ध कराने के लिए पूरी रिपोर्ट नेट में अपलोड कराएं। इसके लिए उन्हें 10 अप्रैल तक का समय दिया गया था। जिले के 414 निजी स्कूलों में 374 स्कूल संचालकों ने अपनी पूरी जानकारी नेट में उपलब्ध करा दी है, लेकिन 40 स्कूलों ने यह जानकारी 3 मई तक भी नहीं उपलब्ध कराई है।

इसके चलते शिक्षा विभाग ने 3 मई की शाम तक का उन्हें और मोहलत दिया था। जो स्कूल संचालक शाम अपनी पूरी जानकारी नेट में उपलोड नहीं कराएंगे उन स्कूलों की मान्यता समाप्त कर दी जाएगी।


जिन निजी स्कूल संचालकों ने मान्यता संबंधित शर्तों का अब तक पालन नहीं किया है ऐसे स्कूल संचालक अब डीईओ आफिस के चक्कर काटते फिर रहे हैं। गुरुवार को दफ्तर में भीड़ लगी रही। जबकि डीईओ आफिस के क्लर्क पिछले पखवाड़े भर से उन्हें फोन में दर्जनों बार कॉल कर स्पष्ट निर्देश देते आ रहे हैं। ताकि स्कूलों की मान्यता बचाई जा सके। इसके बाद भी उनकी आंख नहीं खुली थी। अब यही स्कूल संचालक डीईओ आफिस के चक्कर काट रहे हैं।


ऐसा इसलिए कर रही सरकार
निजी स्कूल संचालक शिक्षा के अधिकार के तहत गरीब बच्चों को भर्ती लेने के लिए कोताही बरतते हैं। यदि भर्ती ले भी लेते हैं तो अधिकतर स्कूल संचालक गरीब बच्चों से फीस भी लेते हैं। यदि तह तक जाएं तो फीस लेने वाले दर्जनों स्कूल मिल जाएंगे।

दिलचस्प बात यह है कि निजी स्कूलों को सरकार फीस के रूप में मोटी रकम देती है। प्राइमरी मिडिल के प्रत्येक बच्चों के लिए 700 रुपए एवं हाईस्कूल के बच्चों के लिए 1400 रुपए दिया जाता है। इसके बाद भी निजी स्कूल संचालक चौतरफा कमाई के फेर में रहते हैं। वे चाहते हैं कि उनके रिक्त सीटों की संख्या सार्वजनिक करने से बच जाएं और चौतरफा आमदनी भी होती रहे। जिस पर सरकार शिकंजा कसना चाह रही है।