
bhagoria tribal festival
झाबुआ। आदिवासी अंचल के सांस्कृतिक पर्व भगोरिया को विश्व धरोहर घोषित करवाने की कोशिशें कागजों से बाहर नहीं आ पा रही हैं। यही वजह है कि जनजातीय संस्कृति की इस पारंपरिक प्रसिद्धि-पहचान का दायरा प्रदेश के कुछ जिलों में सिमट गया है। राज्य से केंद्र सरकार के बीच घूम रही सरकारी फाइलें कब यूनेस्को तक पहुंचेंगी, यह सवाल अब वनवासी अंचलों में फिर पूछा जा रहा है, क्योंकि भगोरिया करीब आ रहा है! दरअसल, संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन (यूनेस्को) विश्व की संस्कृतियों को संरक्षित करने का कार्य करता है। सांस्कृतिक पर्वों का अध्ययन कर यूनेस्को विश्व धरोहर घोषित करता है। इससे आयोजन विश्व प्रसिद्ध हो जाता हैं।
भगोर से शुरू हुआ भगोरिया
माना जाता है भगोरिया की शुरुआत राजा भोज के कालखंड में हुई थी। तत्कालीन भील राजाओं कासूमरा और बालून ने अपनी राजधानी भगोर में मेले की शुरुआत की। इसके बाद अन्य क्षेत्रों में भी यह आयोजन होने लगा। कालांतर में स्थानीय हाट और मेलों में लोग इसे भगोरिया कहने लगे। पश्चिमी निमाड़, झाबुआ-आलीराजपुर, धार, बड़वानी में भगोरिया धूमधाम से मनाया जाता है। भगोरिया के दौरान ग्रामीण जन ढोल-मांदल एवं बांसुरी बजाते हुए मस्ती में झूमते हैं। गुड़ की जलेबी, भजिये, खारिये (सेंव), पान, कुल्फी की दुकानों से मेले सजे रहते हैं।
लोक संस्कृति का उत्सव दुनिया देखे
परंपरागत जनजातीय कला के जरिए हाल ही में पद्मश्री का सम्मान पा चुके शांति-रमेश परमार अपनी असहमति दर्ज करवाते हुए कहते हैं, भगोरिया पर्व को सालों पहले ही यूनेस्को की सूची में शामिल कर लिया जाना चाहिए था, क्योंकि यह केवल उत्सव नहीं, पुरातन संस्कृति का प्रतिबिंब है। प्रशासन को ही अपनी ओर से ऐसे निर्णायक प्रयास करना होंगे, जिससे लोक संस्कृति के इस उत्सव को देश-दुनिया में पहचान मिल सके। भगोरिया उत्सव की विशेषता यही है कि जिले का आदिवासी देश-प्रदेश के किसी भी कोने में क्यों न हो, घर लौट ही आता है। पूरे सात दिन उत्सव में डूबा रहता है। यही उत्साह उसे सालभर अथक परिश्रम के लिए प्रेरित करता है।
आदिवासियों के जरिए स्वैच्छिक परिश्रम की सामूहिक परिभाषा रचने वाले झाबुआ के दूसरे पद्मश्री महेश शर्मा कहानी के जरिए बात आगे बढ़ाते हैं, "तानसेन से अकबर ने कहा, मुझे तुम्हारे गुरु से मिलना है।" जवाब मिला, "मैं तो आपका नौकर हूं। जो चाहे वो गवा लेते हो, लेकिन मेरे गुरु को सुनने के लिए उनके पास ही जाना होगा।" ऐसे ही भगोरिया प्रदर्शन नहीं, परंपरा का उत्सव है। जनजाति समाज इसे आंतरिक रूप से मनाता है। इसे प्रोत्साहित करने के लिए परंपरागत वेशभूषा, गहने, मिलने और संवाद के परंपरागत तौर-तरीकों में बाहरी दखल नहीं होना चाहिए। स्वतंत्रता, उदारता, हंसी-ठिठोली के इस उत्स व में दर्शक कोई नहीं रहता, सभी भागीदार हो जाते हैं। इसी विशेषता को यूनेस्को के जरिए यदि दुनिया देखेगी, हमारी ही संस्कृति का सम्मान बढ़ेगा।
Updated on:
22 Feb 2023 06:14 pm
Published on:
22 Feb 2023 06:09 pm

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