अरूण त्रिपाठी
झालावाड़.क्या आपने कभी सुना है कि भक्त को भगवान के दरबार में पूजा-पाठ के लिए सालभर से ज्यादा इंतजार करना पड़े और श्रद्धालु भी इसके लिए सहज ही तैयार हो जाए।
यहां बात हो रही है आस्था और विश्वास के जीते-जागते उदाहरण झालरापाटन के नवलखा किला स्थित सिद्धपीठ आनंदधाम की। दूर-दराज से आने वाले भक्त बालाजी महाराज की कृपा पाने और मारवाड़ वाले बा साहब का आशीर्वाद लेने के लिए सालभर अर्जी लगाते हैं।
मंदिर समिति उपाध्यक्ष मुकेश सक्सेना ने बताया कि मंदिर में चोला चढ़वाने के लिए यहां मंगलवार और शनिवार की तारीख साल भर पहले ही बुक हो जाती है। इसके लिए बकायदा लोगों की सूची मंदिर परिसर में चस्पा की जाती है।
–खेजड़ी के पेड़ के नीचे मिली प्रतिमा
आनंदधाम मंदिर के पीछे खेजड़ी के पेड़ के नीचे से 27 साल पहले बालाजी महाराज की छोटी प्रतिमा प्रकट हुई थी। इसके बाद पूजा शुरू हो गई। वह प्रतिमा आज मुदिर में विराजित बालाजी महाराज की बड़ी प्रतिमा की दाहिनी ओर स्थापित है।
–दूर-दराज से श्रद्धालु पहुंचते
मंदिर समिति वरिष्ठ सदस्य मनोज जैन ने बताया कि साल के दोनों नवरात्र के दौरान 9 दिन तक दूर-दराज से यहां श्रद्धालु पहुंचते हैं। आस्था ऐसी कि संध्या से प्रात: तक परेशानियों और समस्याओं का समाधान तलाशा जाता है। मारवाड़ वाले बा साहब के दरबार में श्रद्धालु अर्जी लगाते हैं। शरद पूर्णिमा के दिन श्वांस और दमा से पीडि़त लोगों को नि:शुल्क दवा और औषधि से मिश्रित खीर का वितरण किया जाता है।
–गद्दीनशीन अमित सुनते पीड़ा
लगभग 38 साल तक मारवाड़ वाले बाबा साहब के आशीर्वाद स्वरूप गद्दीनशीन कमलेश सेन दरबार में श्रद्धालुओं की समस्याएं सुनते रहे। कोरोना काल में 11 मई को उनके ब्रह्मलीन होने के पश्चात उनके पुत्र अमित सेन पिता के कार्य को आगे बढ़ा रहे हैं। और, आस्था का सैलाब ही है कि मुक्त हस्त मिल दान राशि से विकास कार्यों पर करोड़ों का खर्च हो रहा है। स्थानीय बुजुर्ग और जानकार लोग बताते हैं कि मारवाड़ वाले बाबा साहब के दरबार में हाजिरी लगाने और उसके बाद सकारात्मक परिवर्तन से प्रफुल्ल लोग खुले हाथों से गुप्त दान करते हैं। इसी धनराशि से ही मंदिर की सारी व्यवस्थाओं का संचालन किया जाता है। भक्ति अपनी श्रद्धा से गुप्त दान करते हैं।
–सिद्धपीठ की महिमा निराली
मंदिर समिति आचार्य रामकुमार गौतम ने बताया कि बसंत पंचमी पर ही सारे विशेष कार्य शुरू किए जाते हैं। वजह यह कि साल 2000 की फरवरी में बसंत पंचमी के दिन से ही बालाजी की प्रतिमा निर्माण का कार्य शुरू हुआ। मूर्तिकार ने केवल मंगलवार-शनिवार को मूर्ति को स्वरूप प्रदान किया।
–चोला चढ़वाने के लिए सालभर की वेटिंग
मंदिर उपाध्यक्ष मुकेश सक्सेना ने बताया कि मंदिर में चोला चढ़वाने के लिए यहां मंगलवार और शनिवार की तारीख साल भर पहले ही बुक हो जाती है। इसके लिए बकायदा लोगों की सूची मंदिर परिसर में चस्पा की जाती है।
–पारे को जोड़कर बनाया शिवलिंग
मंदिर समिति सचिव अमित सेन ने बताया कि आनंद धाम सिद्ध पीठ पर 108 किलो पारे से पारद शिवलिंग की स्थापना की भी कहानी अनूठी है। दरअसल, पारे के शिवलिंग की स्थापना का विचार वर्ष 2002 में मंदिर समिति के जेहन में आया। इसके बाद इसे अमली जामा पहनाने के प्रयास शुरू हुए। अलग-अलग जगहों से पारा मंगवाया गया। मंदिर परिसर में ही इसे जोड़कर प्रतिमा निर्माण की कई कोशिशें हुई लेकिन कामयाबी नहीं मिली। इसके बाद नेपाल से आए संत व मारवाड़ वाले बाबा साहब के सानिध्य और भालता वाले ब्रह्मचारी संत नित्यानंद महाराज की प्रेरणा से झालावाड़ निवासी हरीश कुमार पाथेय ने इसका निर्माण स्थापना से 8 दिन पहले किया। पाथेय जिले में एकमात्र व्यक्ति थे जो पारे को जोड़ (बांध) सकते थे। संभवत: यह राजस्थान का एकमात्र 108 किलो पारे से निर्मित शिवलिंग है। पाथेय की मृत्यु 15 अप्रैल 2018 को हुई।