
पहले मां कालिका को पूजा, फिर लगाया अफीम के डोडे में चीरा
भवानीमंडी. शहर से सटे मध्यप्रदेश व राजस्थान क्षेत्र में अफीम की फसल पूरे जोरों पर है। किसानों ने शुभ मुहूर्त में मां कालिका की पूजा अर्चना के साथ फसल के डोडों की चिराई शुरू कर दी है। जिससे क्षेत्र में कसेली महक महकने लगी है। किसान परिवार शाम को डोडों पर लुई से चीरा लगाते हैं। इसके बाद सुबह डोडों पर जमा अफीम का दूध पात्र में एकत्र करते हैं। यह क्रम लगातार एक माह तक जारी रहेगा। इसके बाद सूखे डोडों से पोस्तदाना निकाला जाता है। इस दौरान पूरा किसान परिवार खेत पर अस्थाई घर बनाकर रात-दिन खेत पर रतजगा करता है एवं फसल की रखवाली करता है।
तोतों से बचाएगी घंटी
अफीम उत्पादक मध्यप्रदेश की रेहटड़ी गांव निवासी काश्तगार महिला ने बताया की इस बार अफिम के डोडों का तोतों से बचाव करने के लिए घंटी लगाई है जिसे तोतों के आने पर बजाया जाता है। तोते डोडों को नुकसान पहुंचाते हैं। वही भैसानी पंचायत के दोबड़ा गांव निवासी किसान गोपाल सिंह ने बताया कि सुबह व शाम के समय अफीम के डोडों का विशेष ध्यान रखना पड़ता है। इस समय तोते अफीम खाने के लिए झपट्टा मारते है एवं पौधों को नुकसान पहुंचाते हंै।
अफीम तस्कर सक्रिय
अफीम खेतों में निकलने के साथ ही इसकी तस्करी करने वाले भी सक्रिय हो गए है। तस्कर पहले से ही इसकी अच्छी व औसत से अधिक पैदावर को देखते हुए अफीम उत्पादक किसानों से सम्पर्क कर रहे है। ऐसे में होने वाले अच्छे उत्पादन को देखते हुए इसकी बड़ी मात्रा तस्करी होने की पूरी संभावना है।
पहले मां काली की पूजा
क्षेत्र के अफीम उत्पादक काश्तकारों में फसल पकने पर पौधे पर लगने वाले डोडे से अफीम दूध की अच्छी आवक व सुख समृद्धि की मनोकामना से शुभ मुहूर्त में माता कालिका की पूजा अर्चना करने की परंपरा है। इसे क्षेत्रीय भाषा में नाणा भी कहा जाता है। नाणे से पूर्व किसान सपत्नी घरों से थाली में पूजा का समान सजाकर खेत पर पहुंचते है एवं शुभ दिशा में नौ प्रतिमाओं की स्थापना कर माता की रोली बांध कर घी व तेल के दीपक जलाकर व अगरबत्ती लगाकर मां कालिका की पूजा अर्चना कर नारियल फोड़ कर चढाते है। इसके बाद पांच पौधों पर रोली बांध कर डोडों पर चीरा लगा कर सभी को गुड़, धनिया व नारियल की प्रसाद वितरीत किया गया।
मुंह मांगी मजदूरी
हालांकि अभी अधिकांश जगह डोडा चिराई का कार्य बड़े पैमाने पर शुरू नहीं हुआ। इसके बाद भी लुनाई-चिराई के लिए दक्ष मजदूरों का टोटा पडऩे लगा है। चूंकि लुनाई-चिराई के लिए विशेष तकनीक की आवश्यकता होती है, यही कारण है कि इसमे दक्ष मजदूर मुंह मांगी मजदूरी लेते हैं। किसानों को भी मजबूरी में उनको ३००-४०० रुपए प्रतिदिन मजदूरी तक देना पड़ रही है।
Published on:
26 Feb 2019 10:36 am
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