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Hariyali Teej 2023: महिलाएं आज मां पार्वती की पूजा कर मना रही है तीज का त्योहार, जानिए पहले से अब तक क्या आया बदलाव?

ariyali Teej 2023: राजस्थान में तीज के त्योहार का उल्लास नजर आ रहा है। द्वितीय श्रावण (शद्ध) शुक्ल तृतीया पर शनिवार को तीज का त्योहार मनाया जा रहा है।
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झालावाड़/पत्रिका न्यूज नेटवर्क। Hariyali Teej 2023: राजस्थान में तीज के त्योहार का उल्लास नजर आ रहा है। द्वितीय श्रावण (शद्ध) शुक्ल तृतीया पर शनिवार को तीज का त्योहार मनाया जा रहा है। इस दिन पार्वती स्वरूप तीज माता की पूजा-अर्चना की जाती है।

ज्योतिषाचार्य पंडित बालकृष्ण दुबे ने बताया कि इस दिन पार्वती स्वरूप तीज माता की पूजा-अर्चना और आराधना की जाती है, ये तीज गौरी का पर्व है, ऐसे में माता गौरी की पूजा-अर्चना करना श्रेष्ठ माना जाता है। इस दिन महिलाएं मेहंदी लगाती है। वहीं नवविवाहिताओं के पीहर से सिंजारा आता है, जिसमें घेवर के साथ कपड़े और सुहाग की वस्तुएं आती है। वहीं जिन युवतियों की सगाई हो चुकी, उनके ससुराल से सिंजारा आता है। श्रावणी तीज के नाम से भी जाना जाता है। यह सावन मास का सबसे महत्वपूर्ण पर्व है। महिलाएं इस दिन का पूरे वर्ष इंतजार करती हैं। हरियाली तीज सौंदर्य और प्रेम का पर्व है। इस दिन हरे रंग का विशेष महत्व होता है। इस दिन हरी साड़ी व चूड़ियां भी पहनने का प्रचलन है।

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ग्रामीण अंचल में अब नहीं पड़ते सावन के झूले: सावन माह का अंतिम सप्ताह चल रहा है, लेकिन पेड़ों पर न तो सावन के झूले पड़ते हुए और न ही घरों के आंगन व बाग-बगीचों में सखियों की रौनक दिखाई दे रही है। एक जमाने में सावन शुरू होते ही बाग-बगीचों में झूलों का आनंद लिया जाता था। विवाहित बेटियां मायके आकर इस तरह के आयोजन में शामिल होती थीं। अब न तो झूले पड़ते हैं और न ही गीत सुनाई देते हैं। कस्बे सहित ग्रामीण क्षेत्र की बुजुर्ग महिला धापूबाई धाकड़ ने बताया कि पहले सावन का महीना आते ही पेड़ों पर झूले डाले जाते थे। शादी के बाद महिलाएं पहला सावन मायके में ही मनाने की परंपरा रही है। महिलाएं सावनी गीत गाया करती थीं। समय के साथ-साथ पेड़ गायब होते गए और बहुमंजिला इमारतों के बनने से आंगन का अस्तित्व लगभग समाप्त हो गया।

अब न रहे पहले जैसे बगीचे: अब न तो पहले जैसे बगीचे रहे और न ही मोर की आवाज सुनाई देती है। यानी बिन झूला झूले ही सावन गुजर जाता है। इसे लगातार पड़ रही प्राकृतिक आपदाओं के कहर का असर माना जाए या वन माफियाओं की टेढ़ी नजर का परिणाम की गांवों में बगीचे नहीं बचे।

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राधा-कृष्ण झूले थे, तभी से परंपरा जारी: भारतीय संस्कृति में झूला झूलने की परंपरा वैदिक काल से ही रही है। भगवान श्रीकृष्ण-राधा के संग झूला झूलते थे। गोकुल, वृंदावन में उनके झूला झूलने के किस्से काफी ख्यात रहे हैं। सभी यह बात जानते भी हैं, लेकिन अब आधुनिक परंपराओं ने इसे ढंक दिया, स्वरूप को ही बदल डाला है।

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