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इस मटके का पानी पी लिया तो फ्रिज का पानी पीना भूल जाएंगे आप

पचलंगी, छापोली व रेवासा की चिकनी मिट्टी से बर्तनों की वैसे तो हर मौसम में मांग रहती है। लेकिन सर्दियों में बने मटकों की गर्मियों में बहुत अधिक मांग रहती है। सर्दी में बने मटकों में गर्मी में पानी अधिक ठंडा रहता है।

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पत्रिका न्यूज़ नेटवर्क/पचलंगी। पचलंगी, छापोली व रेवासा की चिकनी मिट्टी से बर्तनों की वैसे तो हर मौसम में मांग रहती है। लेकिन सर्दियों में बने मटकों की गर्मियों में बहुत अधिक मांग रहती है। सर्दी में बने मटकों में गर्मी में पानी अधिक ठंडा रहता है। इसलिए गर्मी शुरू होते ही चिकनी मिट्टी के मटकों की मांग बढऩे लगी है। मिट्टी उद्योग से जुड़े कैलाश कुमावत मंडावरा,पांची देवी , लूणा राम कुमावत, मन्नी देवी कुमावत, पाला राम कुमावत सहित अन्य ने जानकारी दी कि पचलंगी की चिकनी मिट्टी बर्तन बनाने के लिए प्रसिद्ध है।

यहां की मिट्टी बर्तन बनाने के लिए सिरोही, गुहाला, चला, बाघोली, मणकसास सहित अन्य सीकर व झुंझुनूं जिले के गांवों व कस्बों के कुंभकार भी लेकर जाते हैं। पचलंगी, बाघोली, सराय ,सुरपुरा , मणकसास, सिरोही के कुंभकारों ने जानकारी देते हुए बताया कि पहले चिकनी मिट्टी पचलंगी के पलीमा से लाई जाती थी। वहीं अब यह मिट्टी रेवासा [सीकर] से मंगाई जाती है। इस चिकनी मिट्टी के सर्दी में बने मटकों की ठंडे पानी के लिए गर्मी में बहुत अधिक मांग रहती है। लोग गर्मी में ठंडे पानी के लिए सर्दी के बने मटके अधिक खरीदते हैं। शांति देवी कुड़ी ,अनिता शर्मा ,मंजू कुड़ी, संतोष जांगिड़, रेणु कुड़ी, ग्यारसी देवी जांगिड़ सहित अन्य का कहना है कि सर्दी में बने मिट्टी के मटको में पानी अधिक ठंडा रहता है।

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सरकारी संरक्षण की है जरूरत:
कुंभकार कैलाश कुमावत मंडावरा, लूणाराम पचलंगी,पंच सीता देवी कुमावत,प्रमोद कुमावत ने जानकारी दी कि इस व्यवसाय से जुड़े लोग सरकार से संरक्षण नहीं मिलने के कारण गुजरात, महाराष्ट्र सहित अन्य प्रदेशों में जाकर मजदूरी कर अपना पेट पाल रहे हैं।

बढ़ती बीमारियों की रोक में कारगर मिट्टी के बर्तन:
वर्षों पूर्व जहां मिट्टी के बर्तनों का प्रचलन अधिक था। वहीं बदले समय के साथ लोग इनका उपयोग कम करने लगे। अब फिर से मिट्टी के बर्तनों की ओर लोगों का रुझान होने लगा है। लोग स्वस्थ रहें, इसके लिए खाना बनाने में भी मिट्टी के बर्तनों का उपयोग किया जाने लगा है।

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मांग पर भावों में भी हुआ इजाफा:
चिकनी मिट्टी के बर्तनों की मांग अधिक होने के कारण इनके भावों में भी प्रतिवर्ष इजाफा हो रहा है । पहले 80 से 100 रुपए तक मटका मिलता था। वहीं अब 110 से 170 रुपए तक मटका मिलता है, वह भी साइज के अनुसार। कैलाश कुमावत मंडावरा, मनी देवी पचलंगी, पंच सीता देवी कुमावत पचलंगी सहित अन्य ने जानकारी देते हुए बताया कि पहले मिट्टी निशुल्क मिल जाती थी। वहीं बर्तन पकाने के काम आने वाले ईधंन भी निशुल्क मिलता था।लेकिन अब मिट्टी व ईधंन दूर से मंगवाना पड़ता है व ऊंचे दामों में खरीदना पड़ रहा है। वहीं मजदूरी भी बढ़ गई जिससे खर्चा बढ़ने के साथ ही मिट्टी से बने बर्तनों के भाव भी बढ़ाने पड़ते है।

सरकार करे मिट्टी उद्योग में नवाचार:
मिट्टी उद्योग व्यवसाय से जुड़ी पांची देवी, मन्नी देवी ,निशा देवी सहित अन्य ने कहा कि सरकार इस उद्योग में नवाचार करे। उद्योग से जुड़े कारीगरों को सब्सिडी योजना में ऋण की सुविधा दें व आधुनिकता को देखते हुए बिजली से चलने वाले चाक व अन्य उपकरण सब्सिडी पर उपलब्ध करवाए जाएं ताकि प्राचीन काल से चला आ रहा यह कुटीर उद्योग बड़े पैमाने पर अपना स्थान बना सके। वहीं मिट्टी से बने बर्तनों की बिक्री के लिए भी मिट्टी उद्योग से जुड़े लोगों को अलग से सुविधा मिले। वहीं सरकार नवाचार कर मिट्टी के बर्तन बनाने के इस धंधे को गति देने के लिए कल्याणकारी योजना लागू करें।