
खेतड़ी के रामपुरा की रीढ के टीले में उत्खनन में मिले मंदिर के अवशेष. Photo- Patrika
Shekhawati News: खेतड़ी (झुंझुनूं)। रामपुरा स्थित रीढ़ का टीला (रैड़ा) राजस्थान के महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थलों में शामिल हो गया है। यहां किए गए सर्वेक्षण और वैज्ञानिक उत्खनन में प्राचीन मानव बसावट से लेकर मध्यकालीन मंदिर स्थापत्य तक के सशक्त प्रमाण मिले हैं।
अधीक्षक (उत्खनन) डॉ. विनीत गोधल ने बताया कि टीले का भू-आकृतिक स्वरूप असमतल है, जो वर्षाजल के बहाव, प्राकृतिक अपरदन और लंबे समय तक मानव गतिविधियों का परिणाम है। सतह पर बिखरे मृद्भांडों के टुकड़े, ईंटों के खंड और तराशे हुए पत्थर इस क्षेत्र में लंबे समय तक बसावट का संकेत देते हैं।
सतह पर मिले मंदिर अवशेष विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। बड़े शिलाखंड, अलंकृत पत्थर, स्तंभों के भाग और आमलक के अवशेष इस बात की पुष्टि करते हैं कि यहां कभी भव्य मंदिर रहा होगा, जो समय के साथ नष्ट हो गया। व्यवस्थित उत्खनन में निचली परतों से शुंग-कुषाण कालीन बसावट के प्रमाण मिले हैं।
लाल और धूसर मृद्भांड, चाक निर्मित पात्र और ज्यामितीय अलंकरण उस समय की विकसित कुम्हारी कला को दर्शाते हैं। राख, चारकोल, जली ईंटें और हड्डियों के अवशेष से यह स्पष्ट होता है कि यहां के निवासी दैनिक जीवन में अग्नि का व्यापक उपयोग करते थे।
ऊपरी परतों में कुषाण कालीन निर्माण गतिविधियों के प्रमाण मिले हैं। पकी ईंटों की दीवारें और फर्श इस बात का संकेत देते हैं कि उस समय बसावट अधिक संगठित और स्थायी हो चुकी थी।
मध्यकालीन परतों, विशेषकर गुर्जर-प्रतिहार काल में, एक विशाल चबूतरे पर सात स्तंभ आधार मिले हैं। इनके नीचे मंदिर के खंडित अवशेष दबे पाए गए हैं, जिससे संकेत मिलता है कि पुराने मंदिर के अवशेषों पर नई संरचना का निर्माण किया गया।
उत्खनन में आमलक का भाग, अलंकृत पत्थर और विष्णु की खंडित प्रतिमा भी मिली है। इसके अलावा टेराकोटा मनके, लौह अवशेष और अन्य दैनिक उपयोग की वस्तुएं यहां के लोगों के जीवन स्तर और शिल्पकला को दर्शाती हैं।
ये सभी अवशेष इस स्थल के निवासियों के जीवन स्तर, शिल्पकला, आभूषण निर्माण तथा आर्थिक गतिविधियों की जानकारी प्रदान करते हैं। मनकों की उपस्थिति से यह भी संकेत मिलता है कि यहां के लोग सौंदर्य-बोध से युक्त थे और संभवतः व्यापारिक संपर्कों के माध्यम से अन्य क्षेत्रों से जुड़े हुए थे।
राजस्थान पत्रिका ने 12 दिसम्बर 2025 को ‘रामपुरा गांव में दबे पौराणिक सभ्यता के अवशेष’ शीर्षक से समाचार प्रकाशित किया था। इसके बाद खेतड़ी विधायक धर्मपाल गुर्जर ने केंद्रीय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल को पत्रिका में प्रकाशित समाचार की जानकारी दी। इस पर मेघवाल ने यहां सर्वेक्षण और वैज्ञानिक उत्खनन का कार्य शुरू करवाया।
यह स्थल न केवल स्थानीय स्तर पर मानव बसावट के विकास को दर्शाता है, बल्कि उत्तर भारत के प्रारम्भिक ऐतिहासिक काल के सांस्कृतिक संक्रमण, आर्थिक गतिविधियों और सामाजिक संरचना को समझने के लिए भी अत्यंत उपयोगी साक्ष्य प्रदान करता है।
रीढ़ का टीला से प्राप्त साक्ष्यों के आधार पर क्षेत्रीय इतिहास का नवीन सिरे से निर्धारण किया जा सकेगा। यह एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है।
रीढ़ का टीला एक बहु-स्तरीय और बहु-आयामी पुरातात्विक स्थल के रूप में उभरकर सामने आता है, जहां शुंग–कुषाण कालीन प्रारम्भिक बसावट से लेकर गुर्जर-प्रतिहार कालीन विकसित मंदिर स्थापत्य तक की निरंतर सांस्कृतिक परंपरा विद्यमान है। यह स्थल न केवल स्थानीय इतिहास के अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि यह राजस्थान और उत्तर भारत के व्यापक ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक विकास को समझने के लिए भी एक महत्वपूर्ण स्रोत है।
भविष्य मे क्षेत्रीय सर्वेक्षण के प्रस्ताव बनाकर नवीन सर्वे कार्य किए जाएंगे और पुरातत्विक स्थलों का अध्ययन किया जाएगा।
Published on:
25 Apr 2026 04:48 pm
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