
स्वामी विवेकानंद व्याख्यानमाला
राजेश शर्मा
झुंझुनूं. युवाओं के प्रेरणास्रोत स्वामी विवेकानंद का जिले के खेतड़ी कस्बे से विशेष लगाव रहा है। उन्होंने अपने जीवन में कुल 312 पत्र लिखे, इनमें से 125 पत्र राजस्थानवासियों के नाम थे। आठ पत्र खेतड़ीवालों के लिए लिखकर संदेश भेजे थे। विवेकानंद अपने जीवन में तीन बार खेतड़ी आए। कुल 109 दिन यहां रहे थे। खेतड़ी के तत्कालीन राजा अजीत सिंह ने ही उनका नाम नरेन्द्र से विवेकानंद रखा था। शिकागो यात्रा का खर्चा भी अजीत सिंह ने ही वहन किया था। शिकागो में स्वामी ने जो पगड़ी व चोगा पहना था वह भी खेतड़ी की ही देन थी।
पहला पत्र
स्वामी विवेकानंद पर पीएचडी करने वाले डॉ जुल्फीकार के अनुसार पहला पत्र बीस सितम्बर 1892 को मुम्बई से खेतड़ी के पंडित शंकरलाल को लिखा। इसमें लिखा है कि हमें विदेश यात्रा करनी चाहिए, हमें यह जानना चाहिए कि दूसरे देशों में किस प्रकार की सामाजिक व्यवस्था चल रही है।
दूसरा पत्र
अमरीका रवाना होने से पहले मद्रास (वर्तमान में चेन्नई) से 15 फरवरी 1893 को राजा अजीतसिंह के नाम लिखा। इसमें कुंभकोणम गांव की घटना का जिक्र किया है।
तीसरा पत्र
22 मई 1893 को मुम्बई से राजा अजीत सिंह को लिखा कि प्रकृति ने मानव का निर्माण एक शाकाहारी जीव के रूप में किया है।
चौथा पत्र
1894 को शिकागो से स्वामी अखंडानंद को लिखा कि खेतड़ी की निम्न जातियों के द्वार-द्वार जाओ। उन्हें धर्म का उपदेश दो और भूगोल और अन्य विषयों के विषयों पर मौखिक पाठ पढ़ाओ।
पांचवां पत्र
6 जुलाई 1895 को अमरीका से राजा अजीतङ्क्षसह के नाम लिखा कि मैंने इस देश में एक बीज बोया है, वह अभी पौधा बन गया है। शीघ्र ही वृक्ष बन जाएगा। मैं यहां कई सन्यासी बनाऊंगा। उन्हें काम सौंपकर भारत आऊंगा।
छठा पत्र
11 अक्टूबर 1897 को खेतड़ी के मुंशी जगमोहनलाल को लिखा कि अजीतङ्क्षसह और मैं दो ऐसी आत्माएं हैं जो मानव समाज के कल्याण के लिए एक महान कार्य करने में परस्पर सहयोग करने के लिए जन्मे हैं। राजा अजीतङ्क्षसह नहीं होते तो शायद मैं यहां तक नहीं पहुंच सकता।
सातवां पत्र
कोलकाता से 22 नवम्बर 1898 को लिखा इसमें राजा से अपनी मां व छोटे भाई की सहायता करने के लिए कहा है।
अंतिम पत्र
वेल्लूर मठ से 1898 को राजा के नाम अंतिम पत्र लिखा। इसमें उन्होंने कहा कि जीवन में केवल एक तत्व है जो किसी भी कीमत पर प्राप्त करने योग्य है और वह है प्रेम। अवंत और अथाह प्रेम, गगन की तरह विस्मृत है और समुद्र की तरह गहरा। यही एक जीवन की महान उपलब्धि है, जो यह प्राप्त कर लेता है वह भाग्यशाली है।
(सभी मूलपत्र अभी वेलूर मठ में सुरक्षित हैं)
सबसे बड़ी पुस्तक
झुंझुनूं के भीमसर निवासी डॉ जुल्फीकार स्वामी विवेकानंद पर छह सौ से अधिक पृष्ठों की पुस्तक 'कुलयाते विवेकानंदÓलिख रहे हैं। इसमें स्वामी विवेकानंद का पूरे जीवन की जानकारी है। साथ ही भारत में स्थापित 146 तथा विदेशों में स्थापित 47 रामकृष्ण मठों व रामकृष्ण मिशन संस्थाओं की गतिविधियों को शामिल किया जाएगा। इससे पहले भी डॉ जुल्फीकार स्वामी पर तीन पुस्तक लिख चुके।
Updated on:
12 Jan 2019 12:05 pm
Published on:
12 Jan 2019 11:56 am
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