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उम्र सौ बरस की, जज्बा जवान सा

-द्वितीय विश्व युद्ध के लड़ाके -सूबेदार रहे सीपी जोशी बने युवा पीढ़ी के लिए आदर्श
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जोधपुर

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Amit Dave

Nov 20, 2019

उम्र सौ बरस की, जज्बा जवान सा

उम्र सौ बरस की, जज्बा जवान सा


जोधपुर.
उम्र मंगलवार को पूरे सौ साल की हो गई, लेकिन जज्बा आज भी फौज के किसी जवान सा ही है। आवाज में वो ही सख्ती और जीवन में अनुशासन। अब भी देश के लिए कुछ कर गुजरने का हौंसला।

ये कहानी हैं सेना के सेवानिवृत्त सूबेदार चंडीप्रसाद जोशी की। मूल निवासी उत्तराखंड के हैं, लेकिन 1969 में सेना की वर्दी टांगने के बाद जोधपुर के ही होकर रह गए। जोशी ने मंगलवार को अपना 100वां जन्मदिन मनाया। इनके पांच पुत्रियां हैं। एक अविवाहित बेटी गीता साथ रहती हैं। आज जन्मदिन के मौके बाकी चारों पुत्रियां व मुंह बोले पुत्र वरिष्ठ उद्यमी रामकिशोर विश्नोई के अलावा कई रिश्तेदार मौजूद थे। जोशी ने केक काटा। लगा कि एक सौ साल का जवान जन्मदिन मना रहा है।

जोशी ने भारत की फौज की ओर से 1939 से 1945 तक चला दूसरा विश्व युद्ध लड़ा था। उस लड़ाई में भारतीय सैनिक ब्रिटिश सेना के रूप में बर्मा में जर्मनी, जापान व इटली सेनाओं से लड़ रहे थे। जोशी ने अपने जन्मदिन के दौरान राजस्थान पत्रिका के साथ अपने वे अनुभव साझा किए।

लडऩे आए हैं, सरेंडर करने नहीं
जोशी बताते हैं कि वे गढ़वाल रेजिमेंट में थे। वर्ष 1942 में उनकी बटालियन को रंगून भेजा गया। उस वक्त वे लांस नायक थे। वहां जब जर्मनी की सेना ने उनकी पूरी बटालियन को घेर लिया तो उस समय ब्रिटिश सेना के कमाण्डिंग ऑफिसर ने प्रत्येक अधिकारी-जवान से पूछा कि क्या हमें सरेण्डर करना चाहिए। सबसे अंत में जोशी का नम्बर आया तो, उन्होंने जवाब दिया कि च्हम फौज में लडऩे के लिए आए हैं, सरेण्डर करने के लिए नहीं...वी विल फाइट लास्ट मैन-लास्ट राउण्ड।ज् इतना कहते ही पूरी बटालियन में जोश आ गया।

कोरिडोर बनाकर बढ़ गए आगे

ब्रिटिश अधिकारी ने फील्ड मार्शल केएम करियप्पा (जो उस समय मेजर और भारतीय टुकड़ी के मुखिया थे) को बटालियन की कमान सौंपी। इसके बाद जवानों को इक_ा कर कोरिडोर बनाया गया। सभी जवान गोलियां बरसाते रहे। इससे सेना आगे बढ़ती रही और जर्मनी की सेना कुछ समझ ही नहीं पाई।

रंगून से इम्फाल तक आए पैदल

जोशी ने बताया कि युद्ध के अंतिम दौर में सेना के अधिकारियों से आदेश मिलने के बाद जवान रंगून से पैदल चलकर इम्फाल आए, जहां उनकी पोस्टिंग हुई। बाद में आर्मी एजुकेशन कोर (एईसी) में अलग-अलग जगहों पर रहते हुए जोधपुर तैनात हुए। जोधपुर से रिटायर्ड हुए और यहीं बस गए।