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बाड़मेर के रेगिस्तान में था कभी बंगाल के सुंदर वन जैसा डेल्टा

delhi university news jnvu jodhpur news - एक और नई खोज: दिल्ली विवि की खोज मे गिरल माइंस में मिले शार्क के दांत के जीवाश्म- जेएनवीयू ने कछुए, मगर, घोंघे और डायनासोर के जीवाश्म अब तक खोजे
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बाड़मेर के रेगिस्तान में था कभी बंगाल के सुंदर वन जैसा डेल्टा

बाड़मेर के रेगिस्तान में था कभी बंगाल के सुंदर वन जैसा डेल्टा

जोधपुर. दिल्ली विश्वविद्यालय के भू-विज्ञान विभाग ने बाड़मेर से 40 किलोमीटर दूर गिरल माइंस में शार्क मछलियों के दांत के जीवाश्म खोजे हैं जो यहां समुद्र से अलग हुए पानी यानी लैगून झील की ओर से इशारा करते हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार बाड़मेर के पुगली, गिरल, कपूरड़ी और बोथिया गांव में 58 मिलियन वर्ष पहले बंगाल के सुंदर वन जैसा डेल्टा था। जेएनवीयू के भू-विज्ञान विभाग द्वारा भी इससे पहले की गई खोज में यहां डेल्टा होने का प्रमाण मिला था। जेएनवीयू ने कुछ समय पहले बाड़मेर में ही नाइफा सहित अन्य एंजियोस्पर्म पौधों के जीवाश्म खोजे थे जो वर्तमान में पश्चिमी बंगाल के सुंदर वन डेल्टा में है। जेएनवीयू में बाड़मेर में जीवाश्म की खोज प्रो एससी माथुर, डॉ शंकरलाल नामा, डॉ. वीएस परिहार ने की।

बाड़मेर-जैसलमेर में व्हेल से लेकर डायनोसोर के जीवाश्म
दिल्ली विवि में भू-विज्ञान विभाग के प्रो जीवीआर प्रसाद और प्रियदर्शिनी राजकुमारी ने यह जीवाश्म खोजे हैं। शार्क का पूरा कंकाल नहीं मिला है क्योंकि वह कार्टिलेज का बना होने के कारण लंबे समय तक संरक्षित नहीं रह सकता। ऐसे जीवाश्म अफ्रीकी देशों मोरक्को, नाइजीरिया, नाइजर, यूरोप के बेल्जियम, इंग्लैंड और फ्रंास से बरामद हुए शार्क के जीवाश्म से समानता रखते हैं। बाड़मेर-जैसलमेर में वैज्ञानिकों को आदिकालीन व्हेल, अन्य छोटी मछलियों के दांत, मगरमच्छ के दांत और कछुए की हड्डियों जैसे दुर्लभ जीवाश्म पहले भी प्राप्त हो चुके हैं।

बाड़मेर में थी मैंग्रोव वनस्पति
बाड़मेर के ही गिरल माइन क्षेत्र में 65 से लेकर 58 मिलियन वर्ष के दौरान जीवित रहे पौधों के जीवाश्म भी मिले हैं जो इसके लैगून होने को प्रमाणित करते हैं। जेएनवीयू के शोधकर्ताओं को यहां टेरिडोफाइटा के 13 पादप, 34 एंजियोस्पर्म, दो जिम्नोस्पर्म, 19 कवक और एक शैवाल की प्रजाति की खोज की। यहां एक बीज पत्री और द्विबीजपत्री दोनों बड़े पादप के परागकण भी मिले हैं जो इस बात की ओर इशारा करते हैं कि यहां मैंग्रोव जैसी घनी वनस्पति हुआ करती थी।


‘दिल्ली विवि ने पहली बार शार्क जैसी बड़ी मछलियों के जीवाश्म खोजे हैं, जबकि हमने छोटी मछलियों के जीवाश्म खोजे थे। क्रिटेशियस व पीलियोसीन युग के दौरान फतेहगढ़ तक समुद्र का छिछला किनारा था। समुद्र गुजरात में हुआ करता था। यहां ज्वालामुखी क्रियाएं भी खूब हुई।’

प्रो सुरेश चंद्र माथुर, भू-विज्ञान विभाग, जेएनवीयू जोधपुर