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IIT Jodhpur Develops Bio-Bricks: पराली जलाने से धुएं और प्लास्टिक कचरे के ढेर के बीच अब समाधान की राह आइआइटी जोधपुर ने दिखा दी है। संस्थान के वैज्ञानिकों ने ऐसी पेटेंट तकनीक विकसित की है, जिससे कृषि अवशेष और प्लास्टिक कचरे को सीधे मजबूत निर्माण सामग्री में बदला जा सकता है। यह नवाचार न सिर्फ प्रदूषण घटाएगा, बल्कि सस्ते और टिकाऊ आवास का नया मॉडल भी तैयार करेगा।
स्कूल ऑफ डिजाइन के सहायक प्रोफेसर डॉ. प्रियब्रत राउत्रय के नेतृत्व में विकसित इस तकनीक में दो प्रमुख उत्पाद सामने आए हैं- बायो-ब्रिक्स और एग्रो-प्लास्टिक ब्लॉक्स। बायो-ब्रिक्स धान का पुआल, गेहूं का भूसा और गन्ने के बगास जैसे अवशेषों से तैयार होती हैं। खास बात यह है कि इन्हें पारंपरिक ईंटों की तरह भट्ठी में पकाने की जरूरत नहीं पड़ती, जिससे ऊर्जा खपत और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में बड़ी कमी आती है।
वैज्ञानिकों के अनुसार ये ईंटें कार्बन-नेगेटिव हैं, यानी अपने जीवनकाल में उत्सर्जन से ज्यादा कार्बन को अवशोषित करती हैं। दूसरी ओर, एग्रो-प्लास्टिक ब्लॉक्स मिश्रित प्लास्टिक कचरे और कृषि अवशेषों से बनते हैं। कम ऊर्जा वाली थर्मल फ्यूजन तकनीक से तैयार ये ब्लॉक्स बेहतर तापीय और ध्वनि इन्सुलेशन देते हैं। सबसे अहम यह कि जटिल री-साइक्लिंग के बिना प्लास्टिक कचरे का सीधे उपयोग संभव हो जाता है।
आइआइटी जोधपुर परिसर में बायो-ब्रिक आधारित आवास इकाई का निर्माण जारी है, जबकि देश का पहला बायो-ब्रिक स्ट्रक्चर मॉडल तैयार किया जा चुका है। इस तकनीक को किफायती आवास और ग्रामीण विकास से जोड़ने के लिए स्थानीय निकायों के साथ काम भी शुरू हो गया है।
देश में एक तरफ पराली जलाने से प्रदूषण और दूसरी ओर बढ़ता प्लास्टिक कचरा बड़ी समस्या है। यह तकनीक ‘वेस्ट-टू-वेल्थ’ मॉडल के तहत दोनों समस्याओं को एक साथ संबोधित करती है। डॉ. राउत्रय के अनुसार लक्ष्य केवल कचरा प्रबंधन नहीं, बल्कि निर्माण क्षेत्र को पूरी तरह सर्कुलर और लो-कार्बन बनाना है।
Updated on:
02 Apr 2026 01:52 pm
Published on:
02 Apr 2026 01:52 pm
