scriptCarnival of Jodhpur: Women's rule for whole night in this city | Carnival of Jodhpur: इस शहर में पूरी रात सिर्फ औरतों का राज | Patrika News

Carnival of Jodhpur: इस शहर में पूरी रात सिर्फ औरतों का राज

GangaurCarnival of Jodhpur के रूप में मशहूर हुए धींगा गवर मेले को Women Empower (महिला सशक्तिकरण) का अनूठा उदाहरण माना जा सकता है, जब इस मौके पर पूरी रात लगभग छह सौ साल पुराने इस शहर में औरतों का राज होता है। सोलह दिन की कठिन तपस्या के बाद औरतें अलग अलग स्वांग रचकर हाथों में बेंत लिए शहर भ्रमण पर निकलती है और रास्ते में जगह जगह विराजित गवर माता का पूजन करती है।

जोधपुर

Published: April 19, 2022 03:48:34 pm

जोधपुर. सुयोग्य वर की कामना और अखंड सुहाग के लिए गणगौर का परम्परागत पूजन तो पूरे प्रदेश में होली के दूसरे दिन से चैत्रशुक्ल तृतीया तक होता ही है, लेकिन जोधपुर प्रदेश का एक मात्र ऐसा शहर है, जहां इसके तुरंत बाद एक पखवाड़े तक धीगा गवर पूंजी जाती है। आखिरी दिन औरतें रात को अलग अलग स्वांग रचकर हाथों में बेंत लेकर शहर भ्रमण पर निकलती है तो यह नजारा किसी Carnival से कम नहीं होता। समय के साथ मेले का स्वरूप भी बदला है, लेकिन परम्परा आज भी कायम है। कोई इसे बेंतमार गणगौर का मेला कहने लगा है तो कोई यह मानने लगा है कि इस रात स्वांग बनी किसी औरत के हाथ की बेंत किसी कुंवारे को लग जाए तो उसकी शादी जल्दी हो जाती है।
Carnival of Jodhpur: इस शहर में पूरी रात सिर्फ औरतों का राज
धींगा गवर मेले से एक दिन पवित्र सरोवरों से लोटी भर कर जल जाने के प्रतीक लोटिया के मेले में भी महिलाएं स्वांग रचकर बाहर निकली। इस दौरान दजेर रात तक शहर में कई जगह पैर रखने की जगह तक नहीं थी।
सूर्यनगरी का परकोटा शहर की संकड़ी गलियां धींगा गवर के मेले के दिन पूरी रात गुलजार रहती है। लगभग डेढ़ दर्जन स्थानों पर गवर की स्वर्णाभूषणों से लकदक प्रतिमाएं स्थापित की जाती है। गवर पूजने करने वाली तीजणियां निकलती है तो हर जगह गवर की पूजा करती है और गवर के गीत गाए जाते हैं। इन्हें देखने के लिए पूरा शहर उमड़ पड़ता है। इस बार धींगा गवर का मेला 19 अप्रेल की रात भर रहा है। कोरोनाकाल के, दो साल के बाद यह पहला मौका है, जब पूरा शहर उत्साह के साथ इस मेले की तैयारी में जुटा हुआ नजर आ रहा है। एक दिन पहले लोटियों के मेले के दौरान भी ऐसा उत्साह नजर आया कि शहर की संकड़ी गलियों में तिल भर पैर रखने की जगह भी नहीं बची थी।
ऐतिहासिक ग्रंथों में भी उल्लेख

जोधपुर मेवाड़ के इतिहास पर सन् 1884 तक के महाराणाओं के विस्तृत वृत्तांत व आनुषांगिक सामग्री पर आधारित ' वीर विनोद ' ग्रंथ में महाराणा सज्जनसिंह के आश्रित राजकवि कविराज श्यामलदास ने मेवाड में धींगा गणगौर मनाए जाने का उल्लेख किया गया है । उदयपुर के महाराणा राजसिंह अव्वल ने नाराज अपनी छोटी महारानी को प्रसन्न करने के लिए पारम्परिक रीति के खिलाफ जाकर धींगा गवर को लोकपर्व के रूप में प्रचलित किया था , इसीलिए इसका नाम धींगा गणगौर प्रसिद्ध हुआ । ग्रंथ में कहा गया है कि धींगाई का अर्थ जबरदस्ती है ।
इसलिए नाम पड़ा धींगा गवर

संस्कृत के धिंग ( हठपूर्वक ) से ही धींगा शब्द बना है । जोधपुर में एक मत यह भी है कि धींगा गवर भीलणी के रूप में मां पार्वती का स्वरूप है । गवर पूजन में शिव- पार्वती के हंसी - ठिठोली की प्रसंग कथा भी है । कहा जाता है भगवान शिव के रूप बदल कर पार्वती से हंसी ठिठोली के प्रत्युत्तर में मां पार्वती ने भी वन कन्या का रूप धर कर शिव से हंसी ठिठोली की थी । सूर्यनगरी में करीब छह दशकों से महिला सशक्तिकरण के उद्देश्य से मनाए जाने वाले अनूठे धींगा गवर लोकपर्व का सबसे सुखद पक्ष यह है कि इसमें विधवा महिलाओं को भी गवर पूजने का अधिकार दिया गया है ।
chand_kaur_kalla.jpgलालटेन की रोशनी में विराजित होती थी गवर

आज तो धींगागवर के मेले के दौरान आकर्षक सजा वट व रंग बिरंगी रोशनी के साथ ऑर्केस्ट्रा संगीत के कार्यक्रम तक होते हैं, लेकिन प्राचीन जमाने में धींगा गवर पूजने वाली औरतें लालटेन आदि की रोशनी में ही गवर की पूजा करती थी। गवर दर्शन के बाद भोर से पहले पवित्र सरोवरों में गवर की भोळावणी की जाती थी। जालप मोहल्ला निवासी 92 वर्षीय चांदकोर कल्ला बताती हैं कि पांच छह दशक पूर्व तक चुनिंदा स्थलों पर गवर माता को लालटेन की रोशनी में विराजित किया जाता था। इनमें हटडि़यों का चौक में भी लालटेन की रोशनी में ही गवर दर्शन होते थे। धींगा गवर विदाई की रात सड़क पर पुरुष दिखाई नहीं देते थे । पर्व सादगी से मनाया जाता था । कोई स्वांग नहीं रचता था । महिलाएं पूजा करने के बाद गवर माता के दर्शन कर घरों को लौट जाती थी । स्वांग रचने की परम्परा एक दो दशकों में बढ़ी है। सुनारों की घाटी में चबूतरे पर गवर विराजित की जाती थी।

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