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इस वजह से उड़ रहा लाल मिर्च का सुर्ख रंग, तीखापन भी हुआ कमजोर, किसान चिंतित, जानें पूरा मामला

पूरे देश में मिर्च उत्पादन में तिंवरी-मथानिया के बाद अपना विशिष्ठ स्थान रखने वाले भोपालगढ़ कृषि परिक्षेत्र में इस वर्ष बोई गई मिर्च की फसल में हुए कई प्रकार के रोगों के प्रकोप के कारण न केवल इसका सुर्ख रंग ही उड़ने लगा है, बल्कि इसके स्वाद का तीखापन भी कमजोर सा होने लगा है।

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पी.आर. गोदारा

पूरे देश में मिर्च उत्पादन में तिंवरी-मथानिया के बाद अपना विशिष्ठ स्थान रखने वाले भोपालगढ़ कृषि परिक्षेत्र में इस वर्ष बोई गई मिर्च की फसल में हुए कई प्रकार के रोगों के प्रकोप के कारण न केवल इसका सुर्ख रंग ही उड़ने लगा है, बल्कि इसके स्वाद का तीखापन भी कमजोर सा होने लगा है। क्षेत्र के अधिकतर इलाकों में मिर्च की खड़ी फसल में माथाबंदी व डाईबैक के साथ इस बार झुलसा आदि कई प्रकार के रोगों का प्रकोप होने से पैदावार भी बहुत ही कम होने की आशंका के साथ दवाइयों के खर्च से इसकी प्रति बीघा लागत भी बढ़ गई है। ऐसे में इस बार क्षेत्र के किसान भी मिर्च की उपज को लेकर खासे पेशोपेश में नजर आ रहे हैं। साथ ही हर बार बढ़ते रोगों एवं पानी की कमी के चलते क्षेत्र के ग्रामीण इलाकों में मिर्च की बुवाई का रकबा भी साल दर साल सिमटता जा रहा है।

पहले के मुकाबले कम बुवाई
भोपालगढ़ कस्बे समेत आसपास के कुड़ी, बागोरिया, नाड़सर, रजलानी, बारनी खुर्द, हीरादेसर, ओस्तरां, आसोप, पालड़ी राणावतां, रड़ोद, सोपड़ा, ताम्बड़िया कलां, अरटिया कलां, गोदावास व देवातड़ा सहित क्षेत्र के सोयला, चटालिया, कजनाऊ व बिराई आदि कृषि इलाकों के कई गांवों में हालांकि जलस्तर घटने के चलते पिछले आठ-दस बरस पहले के मुकाबले कम हुए बुवाई क्षेत्र के बावजूद इस बार भी थोड़ी-बहुत मिर्च की खेती की गई है।

ये है रोगों के लक्षण
मिर्च की फसल में पैदा हुए माथाबंदी रोग में पौधे का ऊपरी हिस्सा बंध जाता है और काला पड़ जाता है। इसके चलते न तो पौधे की बढ़वार होती है और न ही नए फूल व मिर्च लग पाती है। वहीं डाईबैक का प्रकोप हो जाने पर तो मिर्च का पौधा और उस पर लगने वाली मिर्च सड़-गल जाती है और पौधे भी पीले पड़ जाते हैं तथा इन पर लगी मिर्च जमीन पर गिर जाती है। जिससे वह खाने लायक भी नहीं रहती और संग्रहण भी नहीं हो पाता है। इन रोगों के प्रकोप से मिर्च की पैदावार पर भी व्यापक असर पड़ता है।


भोपालगढ़ क्षेत्र में यूं घटकर बढ़ने लगा मिर्च का रकबा

वर्ष- बुवाई हैक्टेयर में

2009-10-- 988

2010-11-- 628

2011-12-- 422

2012-13-- 068

2013-14-- 073

2014-15-- 112

2015-16-- 032

2016-17-- 220

2017-18-- 160

2018-19-- 105

2019-20-- 095

2020-21-- 080

2021-22-- 125

2021-22-- 125

2021-22-- 125


फैक्ट फाइल
- 2009-10 में थी 988 हैक्टेयर में बुवाई।
- 2015-16 में रह गई मात्र 32 हैक्टेयर बुवाई।
- 2023-24 हुई है 80 से 100 हैक्टेयर में बुवाई।
- 8-10 साल में बुवाई आ गई 4 से 5 प्रतिशत तक।
- 50-60 मण प्रति बीघा रह गया है उत्पादन
- 1200 से 1400 रुपए प्रति मण में बिकती है हरी मिर्च।
- 2800 से 3000 रुपए प्रति मण में बिकती है लाल मिर्च।
- 50 से 60 हजार रुपए प्रति बीघा आता है खर्च।
- 70 से 80 हजार रुपए तक आया रोगों के कारण इस बार खर्च।

मिर्च की खेती करना अब किसानों के लिए पहले जैसा आसान नहीं रहा है। अब लागत भी बढ़ गई है और तरह-तरह के रोगों का प्रकोप भी बढ़ने लगा है। इस कारण उपज लेने में लागत तो अधिक आ रही है और उपज बहुत कम मिलने से आमद भी घट गई है।
- रामनिवास नायक, किसान भोपालगढ़

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लगातार एक ही खेत में फसल लेने से भूमि की उर्वरा शक्ति में कमी होने तथा विभिन्न रासायनिक कीटनाशक दवाओं के छिड़काव से कवक, जीवाणु व विषाणु अधिक होने के परिणाम स्वरूप रोग प्रतिरोधक क्षमता में कमी होने से भी मिर्च की फसल में उपज घटी है। इसलिए अब जैविक खेती की बेहद आवश्यकता है।
- डाॅ. तखतसिंह राजपुरोहित, पौध विशेषज्ञ

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