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बासनी/जोधपुर. अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान एम्स में राज पेडिकॉन-2017 कॉन्फ्रेंस से एक दिन पहले कार्यशाला में बच्चों को होने वाले अस्थमा के इलाज के लिए चिकित्सा विज्ञान में आए बदलाव और इलाज के नए तरीकों से अवगत कराने के उद्देश्य से नए चिकित्सकों की क्लास ली गई। इसमें अस्थमा के मरीज को सही दवा ठीक समय पर देने पर जोर दिया गया वहीं सांस के रास्ते इलाज करने के कॉसेप्ट इनहैल्ड थैरेपी को सबसे पहले अपनाने की सलाह दी।
बैंगलोर से आए डॉ नागाभूषण ने बताया कि घर में किसी के स्मोकिंग करने, चूल्हा जलाने, दीवारों पर फंगस अस्थमा के कारण बनते हैं। इसलिए घर के वातावरण को चाइल्ड फ्रेंडली रखना चाहिए। अब दीपावली के मौके पर हर घर में साफ-सफाई शुरू हो जाती है। ऐसे में पेंटिंग, घर के रखने पुराने पेपर हटाने और सामान इधर से उधर रखने से घर में छोटे बच्चों को अस्थमा की बीमारी हो सकती है। इसलिए बच्चों को सफाई के समय दूर रखें या वे स्कूल जाएं उसके बाद सफाई करें ताकि वे इसके संपर्क में नहीं आएं। बैंगलोर में एक केस में सामने आया कि घर में रखे पुराने कारपेट से बच्चे को अस्थमा के लक्षण बढ़ गए। इसलिए घर के वातावरण में स्वच्छता का ध्यान रखना जरूरी है। इसके अलावा डॉ जगदीश गोयल, डॉ मुकेश गुप्ता ने भी नई मॉड्यूल पर व्याख्यान दिए।
बच्चे के जन्म से पहले इन बातों का रखें ख्याल
डॉ नागाभूषण ने बताया कि अगर कोई गर्भवती महिला स्मोक करे या उसके आसपास घर के दूसरे सदस्य स्मोकिंग करे तो भी जन्मने वाले बच्चे के लंग्स पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इससे अस्थमा भी हो जाता है। इसलिए गर्भवती महिलाओं को आरोग्य का ध्यान रखना चाहिए। वर्तमान में अंतरराष्ट्रीय गाइडलाइन के अनुसार जिस उम्र में जो मेडिसिन सही काम करे उससे इलाज करना बेहतर होता है। जब अस्थमा सीवियर हो जाए तो उसके लिए एंटीआईजीई नई मेडिसिन आई है। ये देने से बच्चे में अस्थमा के लक्षण कम हो जाएंगे।
नए मॉड्यूल से इलाज करने से नहीं होंगे दुष्प्रभाव
जयपुर से आए शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ बीएस शर्मा ने नए मॉडयूल के बारे में बताया कि पहले अस्थमा के मरीज में जितने लक्षण गंभीर होते थे उतनी मेडिसिन होती थी लेकिन अब जैसे भी लक्षण हो वो जिस कम डोज से नियंत्रित हो जाए वह दी जाती है। इससे मरीज को दुष्प्रभाव नहीं होता है क्योंकि पहले हैवी डोज देने पर दवा लक्ष्य के अलावा शरीर के दूसरे अंगों में चली जाती थी। नए मॉड्यूल के अनुसार इलाज करने से ये परेशानी नहीं होती है। वहीं अस्थमा में सबसे पहले सूंघने वाले दवा पंप के जरिए दी जाती है। इसका प्रभाव ज्यादा होता है। ये एक्शन में जल्दी आती है। वहीं जिन बच्चों में मोटापा होता है। उन्हें अस्थमा सीवियर की संभावना ज्यादा होती है इसलिए मोटापा कम करने से अस्थमा का प्रभाव अपने आप ही कम होता है।
Published on:
07 Oct 2017 04:01 pm
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