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मैं परकोटे के भीतर बसा पुराना शहर बोल रहा हूं, कोरोना ने मेरी गलियों को कर रखा है सूना…

मैं परकोटे के भीतर बसा पुराना शहर बोल रहा हूं। हां वही शहर जो ब्लूसिटी और सनसिटी के नाम से पहचाना जाता है। आप सही समझे, जहां अपणायत बसती है और संस्कृति हिलोरे लेती है...लेकिन मैं दो माह से बंदिशों में जकड़ा हुआ हूं। कोरोना काल ने मेरी गलियों को सूना कर दिया है।
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coronavirus : complete lockdown in inside parts of jodhpur city

मैं परकोटे के भीतर बसा पुराना शहर बोल रहा हूं, कोरोना ने मेरी गलियों को कर रखा है सूना...

अविनाश केवलिया/जोधपुर. लॉकडाउन 4.0 शहर में लागू है। पूरा जिला रेड जोन में है, लेकिन कंटेनमेंट जोन को छोड़ जिंदगी पटरी पर आने लगी है। परकोटा क्षेत्र जहां के कई हिस्सों में पिछले कई दिनों से नए संक्रमित मरीज नहीं मिले हैं, वहां भी लोग कफ्र्यू की बंदिशों के कारण घरों में कैद हैं। शहर की आधी आबादी कंटेनमेंट जोन में है। ऐसे में परकोटा की रौनक कहीं खो गई है। परकोटे की कहानी उसी की जुबानी...

'मैं परकोटे के भीतर बसा पुराना शहर बोल रहा हूं। हां वही शहर जो ब्लूसिटी और सनसिटी के नाम से पहचाना जाता है। आप सही समझे, जहां अपणायत बसती है और संस्कृति हिलोरे लेती है...लेकिन मैं दो माह से बंदिशों में जकड़ा हुआ हूं। कोरोना काल ने मेरी गलियों को सूना कर दिया है। मेरी गोद में बसने वाले भी अब मायूस दिखने लगे हैं। बाहर दौड़ती गाडिय़ों को देख रहा हूं, सोच रहा हंू कब फिर से वही रौनक मेरी गलियों में भी लौटेगी। फिलहाल कुछ कर नहीं सकता...

मेले-तीज-त्योहार कभी मेरे गलियों व सड़कों की रौनक थे। दहलीज पर लगते बाजार ही पहचान थे। रामनवमी का मेला, गणगौर की सवारी, धींगा गवर पर एक पूरी रात सड़कों पर औरतों का राज....या फिर ईद की रौनक...। ये सभी तो मेरी पहचान थे। लेकिन अभी सब शांत है। जैसे कोई नजर सी लग गई मेरी इस पहचान को। मेरी संकड़ी गलियों में लोगों की चहल पहल की जगह आज सन्नाटा है...सिर्फ गश्त करने वाली पुलिस की पदचाप ये सन्नाटा तोड़ती है...'सैण सांकड़ा भला...' की लोकोक्ति मेरे गली मोहल्लों में बसने वाले संयुक्त परिवार चरितार्थ करते हैं...ये भी कभी घरों से बाहर आकर चबूतरी पर बैठ जाते हैं तो पुलिस के डंडों की फटकार मुझे सहमा देती है।

ये मेरी ही पहचान है कि यहां मंदिर की मंगला आरती और मस्जिद की अजान एक साथ होती है। गंगा-जमुनी तहजीब की लोग मिसाल देते हैं, लेकिन इन दिनों आरती होती है, अजान होती है लेकिन आपस में बतियाते भा और भाईजान को देखे बिना मुझे कुछ भी हजम नहीं हो रहा। ईद आ रही है, लेकिन सेवइयों की मिठास घरों में ही कैद होकर रह जाएगी...ऐसा मैं स्थापना के 562 वर्ष में पहली बार महसूस कर रहा हूं।

खैर, अभी भले ही कोस रहे होंगे लोग मेरी बनावट को, लेकिन यह जंग जीत कर मैं फिर उठ खड़ा होउंगा... लाखों की संख्या में बसने वाले मेरे जिंदादिल लोग फिर खिलखिलाएंगे। बहुत सब्र रखा है मैंने, अब बस कुछ दिन और हैं...। उम्मीद लगाए बैठा हूं कि अब कोरोना की चेन और गलियों में लगी बल्लियों की ये बेडिय़ां टूटेंगी और फिर मैं इठलाने लगूंगा शहर-ए-आफताब के रूप में। आमीन...