
जघन्य हत्या के पांच आरोपियों को फांसी की सजा उम्रकैद में बदली
जोधपुर.
राजस्थान हाईकोर्ट (rajasthan highcourt) ने जमीन विवाद में एक ही परिवार के चार लोगों की हत्या के दस साल पुराने मामले में पांच आरोपियों को दी गई फांसी की सजा आजीवन कारावास में बदल दी (five accused of heinous murder turned into life imprisonment)। कोर्ट ने अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश,पाली (Additional Sessions Judge) की ओर से दी गई फांसी की सजा की पुष्टि न करते हुए कहा कि आरोपी शेष प्राकृतिक जीवन तक जेल में ही रहेंगे, वे पैरोल, प्री-मैच्योर रिलीज या ओपन जेल में शिफ्ट होने के पात्र नहीं होंगे।
न्यायाधीश संदीप मेहता और न्यायाधीश विनीतकुमार माथुर की खंडपीठ ने अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश (पाली) की ओर से भेजे गए डेथ रेफरेंस तथा आरोपियों की अपील निस्तारित करते हुए पीडि़त परिवार को राजस्थान पीडि़त प्रतिकर योजना से वर्तमान में प्रभावी अधिकतम मुआवजा देने के निर्देश देते हुए पाली जिला विधिक सेवा प्राधिकरण को यह सुनिश्चित करने को कहा है।
भारी मन से नहीं की फांसी की पुष्टि
खंडपीठ ने फैसले में कहा, सुप्रीम कोर्ट ने एक आदेश में कहा है कि फांसी जैसी सख्त सजा की पुष्टि करने से पहले संबंध में जेल और समाज कल्याण विभाग से आरोपियों के आचारण संबंधी रिपोर्ट ली जानी चाहिए। आचरण में उत्तेजक स्थितियां नहीं पाई जाएं तो फांसी जैसी सख्त सजा देने से बचना चाहिए। यह कवायद किए बिना जघन्य अपराध (रेयरेस्ट टू रेयर) में भी फांसी की सजा नही दी जा सकती। कोर्ट ने कहा, हम यह कवायद कर सकते थे, लेकिन अब अपराध को दस साल गुजर चुके हैं, इसलिए अब ऐसा करना उचित नहीं पाते। हम भारी मन से ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई फांसी की सजा की पुष्टि नहीं कर सकते। लेकिन ऐसा जघन्य अपराध करने वालों को किसी तरह की स्वतंत्रता की छूट यानी सजा का लघुकरण, पैरोल या ओपन जेल में रहने का लाभ भी नहीं मिलना चाहिए।
यह है मामला
पाली जिले के भांगेसर गांव की सीमा में 19 जुलाई, 2009 को एक जघन्य प्राणघातक हमले में आरोपी शहाबुद्दीन, शकूर खान, कालू खान, उस्मान खान औ रहीम बख्श ने जमीन विवाद को लेकर एक ही परिवार के शरीफ, बाबू खान, लाल मोहम्मद और साबिर की हत्या कर दी थी। ट्रायल के बाद पाली के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने 6 अक्टूबर, 2016 को सभी पांच आरोपियों को भारतीय दंड संहिता की अन्य धाराओं में अधिकतम एक साल तथा हत्या के जुर्म में फांसी की सजा सुनाते हुए इसकी पुष्टि के लिए प्रकरण हाईकोर्ट को प्रेषित किया था।
Published on:
25 Oct 2019 06:00 am
