
जोधपुर. देश के सबसे बड़े जिले लद्दाख में पहली बार दाल की खेती शुरू की गई है। केंद्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान (काजरी) ने वहां चना व मसूर की दाल के बीज रोपित किए, जहां दाल उगाने में सफलता मिली है। अब तक लद्दाख के बौद्ध भिक्षुओं के लिए जम्मू व कश्मीर से ही दाल आती थी। वे दाल उगाना नहीं जानते। काजरी ने वहां दाल की विशेष वैरायटी लगाई, जो तापसह है। इसके अलावा मक्का व पालक भी पहली बार वहां उगाए गए हैं। नई फसलों को देख बौद्ध भिक्षुओं में खुशी की लहर है।
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) ने गर्म मरुस्थल में शोध के लिए 1959 में जोधपुर में काजरी की स्थापना की थी। इसके 53 साल बाद 2012 में ठण्डे मरुस्थल यानी लद्दाख में कृषि, पशुपालन, वानिकी, बागवानी सहित अन्य कार्यों पर अनुसंधान के लिए काजरी का क्षेत्रीय केंद्र खोला। पिछले सप्ताह काजरी निदेशक डॉ. ओपी यादव स्वयं अपने वैज्ञानिकों के साथ लद्दाख गए और काजरी की ओर से अब तक किए गए शोध कार्यों का जायजा लिया। काजरी की ओर से वहां 5 नई फसलें फसल चक्र में लाई गई है।
250 रुपए किलो अनाज से बनाते हैं रोटी
लद्दाख में सर्दियों में तापमान शून्य से 35 डिग्री नीचे रहता है। वार्षिक वर्षा 100 मिलीमीटर है। वह भी बर्फ के रुप में प्राप्त होती है। पानी की कमी और जोतों का आकार बहुत छोटा होने से कृषि कार्य काफी कठिन है। लद्दाख के लोग बकवीट (एक प्रकार का अनाज) उगाते हैं जो 250 रुपए किलो बिकता है। वहां इसकी रोटी बनती है। वहां गेहूं भी होता है लेकिन वे गेहूं को लाइनों में बोने की बजाय बिखेरकर बुवाई करते हैं। काजरी ने उन्हें गेहूं की नई किस्में देकर कतारों में खेती का प्रशिक्षण दिया है। इससे वहां गेहूं की अधिक उपज हुई और आधा बीज बच गया। इसके अलावा जौ, जई, मटर और सब्जियों की विभिन्न वैरायटी बौद्ध भिक्षुओं को देकर कृषि में नया प्रयोग किया जा रहा है। काजरी ने वहां फसलों की करीब 50 वैरायटियों के बीज दिए हैं।
50 साल पीछे है लद्दाख
लद्दाख में खुरबाणी बहुत होती है लेकिन वे उसको ढंग से सूखा नहीं पाते। हमने उनको काजरी की ओर से विकसित सौलर ड्रायर दिए, जिनसे खुरबाणी का स्वाद ही बदल गया। कृषि तकनीक व जीविकोपार्जन को देखें तो लद्दाख हमसे 50 साल पीछे हैं। वहां पानी बहुत कम है। यह हमारी शुरुआत है। हम वहां कृषि के साथ पशुपालन, बागवानी, वानिकी सहित अन्य क्षेत्रों में भी तकनीक के प्रयोग से लद्दाख को विकास की पटरी पर ले आएंगे।
डॉ. ओपी यादव, निदेशक, काजरी जोधपुर (लद्दाख से लौटकर)