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न बिजली कनेक्शन ना ही ट्यूबवैल, फिर भी लहसुन की पैदावार!

- लहसुन खरीद केन्द्रों पर करोड़ों रुपए के घोटाले का मामला - एसीबी की जांच व किसानों से पूछताछ में उधडऩे लगी घोटाले की परतें - जल्द ही दर्ज होगी एफआइआर --बड़ा खुलासा--
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न बिजली कनेक्शन ना ही ट्यूबवैल, फिर भी लहसुन की पैदावार!

जोधपुर.

किसानों से समर्थन मूल्य पर लहसुन खरीद के लिए जोधपुर व मथानिया में खोले केन्द्रों पर करोड़ों रुपए के घोटाले की परतें उधडऩे लगी हैं। भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो की जांच में सामने आया है कि खेतों में लहसुन की न तो पैदावार हुई थी और ना ही किसानों ने लहसुन बेचा था। व्यापारियों ने किसानों से गिरदावरियां लेकर टोकन प्राप्त कर कागजों में ही ८४ हजार क्विंटल लहसुन बेचकर करोड़ों रुपए डकार लिए। अब जल्द ही संबंधित अधिकारियों, कर्मचारियों व किसानों के खिलाफ एसीबी में एफआइआर दर्ज होगी।
ब्यूरो के अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक गोपाल सिंह भाटी ने बताया कि परिवाद के संबंध में चल रही जांच के तहत किसानों और मध्यप्रदेश में नीमच के उन व्यापारियों से पूछताछ की गई जिन्होंने दस्तावेजों में बिक्री केन्द्र में बेचे गए लहसुन की खरीद की थी। सामने आया कि खेतों में लहसुन की पैदावार ही नहीं हुई थी। एेसे भी कई किसान सामने आए हैं जिनके खेत में न तो बिजली कनेक्शन है और ना ही ट्यूबवेल, फिर भी दस्तावेजों में उन्होंने लहसुन बेचा है।

पूछताछ में किसानों ने बताया कि उन्होंने पानी पड़ोसी ट्यूबवेल से लिया था। हालांकि इस संबंध में कोई लिखित सहमति पेश नहीं कर पाए।
खेत पति के नाम, चेक पत्नी के नाम, रुपए उठाए तीसरे ने

जांच में सामने आया कि संतोष के नाम बिक्री केन्द्र में एक टोकन से १.३० लाख रुपए का लहुसन बेचा गया था। जबकि खेत संतोष के पति के नाम है। टोकन पत्नी को जारी कर दिया गया था। चेक भी संतोष के नाम जारी हुआ और उसके बैंक खाते में जमा भी हो गया था, लेकिन प्रेमाराम नामक व्यक्ति ने खेत इजारे पर लेने के नाम पर यह राशि रोकड़ ले ली। एसीबी ने संतोष से पूछताछ की तो पता लगा कि उसके खेत में लहसुन की पैदावार ही नहीं हुई।
पैदावार के बाद खेत इजारे पर लेने के सहमति पत्र बने

जिले में लहसुन की फसल जून में तैयार हो जाती है। कई खेतों में लहसुन की उपज भी हुई। जो अभी तक खेतों में ही पड़ी है, क्योंकि निर्धारित मापदण्ड का लहसुन न होने से किसान खरीद केन्द्रों पर बेचने ही नहीं आए थे। लहसुन खरीद केन्द्रों से लाभ उठाने वालों ने एेसे किसानों से पैदावार होने के बाद की तारीख में खेत इजारे (खेती करने के लिए) पर लेने के सहमति पत्र बनवाए थे। एसीबी का मानना है कि इजारे पर लेते ही सहमति पत्र बनने चाहिए थे।
३० हजार में खरीदा, ३० हजार कमीशन, बेचे १.३० लाख में

एसीबी का मानना है कि व्यापारियों ने राजफैड के अधिकारियों के साथ मिलकर करोड़ों के वारे-न्यारे किए हैं। कई किसानों ने अपने खेत में पैदा लहसुन को इसलिए नहीं बेचा कि वो निर्धारित मापदण्ड पर खरे नहीं थे। कुल उपज का मात्र बीस से दस प्रतिशत लहसुन ही बिक्री योग्य था। इन किसानों ने मण्डी से टोकन लिए। व्यापारियों से सम्पर्क किया। उनसे तीस हजार रुपए में बाहर का लहसुन खरीदा। तीस हजार रुपए कमीशन व खर्चे के दिए और लहसुन बेच दिया। बदले में उन्हें १.३० लाख रुपए का चेक जारी हो गया।