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मंडोर उद्यान की बदहाली पर हाईकोर्ट का कड़ा रुख

अफसरों के बंगलों के उद्यान गुलजार, सार्वजनिक उद्यानों का कोई धणीधोरी नहीं! हाईकोर्ट ( Rajasthan High Court )

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High Court's stance on the demise of Mandore gardens

मंडोर उद्यान की बदहाली पर हाईकोर्ट का कड़ा रुख


जोधपुर. मंडोर उद्यान (Mondore Gardarn) के रखरखाव के लिए अपेक्षित बजट तो दूर, सारसंभाल के लिए चार साल से न उद्यान अधीक्षक है और न निरीक्षक। रामभरोसे छोड़ दिए ऐतिहासिक उद्यान के कायाकल्प के लिए दायर जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान बुधवार को अधिकारी बगलें झांकते नजर आए। एक के बाद एक चौंकाने वाले खुलासों से हतप्रभ हाईकोर्ट (Rajasthan High Court) की खंडपीठ को जिला कलक्टर से मुखातिब होते हुए यह टिप्पणी करनी पड़ी कि ये हालात वाकई शर्मनाक हैं।


वरिष्ठ न्यायाधीश संगीत लोढ़ा और न्यायाधीश विनीतकुमार माथुर की खंडपीठ में अतिरिक्त महाधिवक्ता करणसिंह राजपुरोहित के साथ जिला कलक्टर प्रकाश राजपुरोहित, जोधपुर विकास प्राधिकरण के आयुक्त गौरव अग्रवाल और सार्वजनिक निर्माण विभाग के अतिरिक्त मुख्य अभियंता संजीव माथुर पेश हुए। कोर्ट के सवाल पर बताया गया कि उद्यान अधीक्षक का पद चार साल से खाली है। इसका चार्ज जयपुर में पदस्थापित अधिकारी के पास है, जो राज्य में उद्यानिकी का एक मात्र अधिकारी है। निरीक्षक के तीनों पद खाली हैं। पिछले साल मार्च में फुटपाथ, प्लास्टर, कलरिंग, स्टील रैलिंग, रिपेयरिंग व रिनोवेशन, स्टोन पिलर, झूलों, टॉयलेट तथा केंटीन के लिए 307 लाख रुपए के प्रस्ताव भेजे, लेकिन सरकार ने एक पैसा मंजूर नहीं किया। सीसीटीवी कैमरे लगाने और विद्युतीकरण कार्यों के 176 लाख रुपए के प्रस्ताव भी ठंडे बस्ते में हैं। करीब 36 लाख रुपए का बजट प्राप्त हुआ जिसे बिजली संबंधी कार्यों पर खर्च किया गया। सुनवाई के दौरान यह भी स्पष्ट नहीं किया गया कि मानव संसाधन की दरकार, स्वीकृत पद और वर्तमान पदस्थापित कार्मिकों की क्या स्थिति है।

जिला कलक्टर ने पिछले कुछ समय में करवाए कार्यों का ब्यौरा दिया, लेकिन कोर्ट के कुछ सवाल अफसरों पर भारी पड़ गए। सरकार ने जवाब में कहा कि 60 लाख रुपए टॉयलेट पर खर्च किए गए। जब पूछा गया कि उद्यान के रखरखाव के लिए 10 लाख रुपए ही आवंटित किए जाते हैं, तो कौनसे टॉयलेट पर इतनी राशि खर्च हुई। बाद में उसका उल्लेख भूलवश होना सामने आया। याची के अधिवक्ता राजवेंद्र सारस्वत ने बताया कि उद्यान के हालात निरंतर बदतर होते जा रहे हैं। सुरक्षा के कोई इंतजाम नहीं है। उन्होंने राजस्थान पत्रिका में मंडोर उद्यान की दुर्दशा पर प्रकाशित समाचारों का हवाला भी दिया।
अफसरों के बंगलों के उद्यान गुलजार

सरकार की अनदेखी और अफसरों की नाकामी पर नाराजगी प्रकट करते हुए खंडपीठ ने कहा, इतना बड़ा शहर होने के बावजूद अधिकारी चार उद्यान तक नहीं संभाल सकते। अफसरों के बंगलों के उद्यानों की पूरी देखरेख होती है, लेकिन सार्वजनिक उद्यानों का कोई धणीधोरी नहीं। वरिष्ठ न्यायाधीश लोढ़ा ने कहा, अफसर हमारे निर्देशों का इंतजार क्यों करते हैं, वे खुद पहल क्यों नहीं करते। अतिरिक्त महाधिवक्ता राजपुरोहित ने कुछ मोहलत देने की मांग की, लेकिन खंडपीठ ने कहा कि समय देने से हालात सुधरने के आसार नजर नहीं आ रहे। डेढ़ साल से याचिका में निर्देश और समय ही दिया जा रहा है। सवा साल से बजट आवंटन के प्रस्ताव पर कोई निर्णय नहीं किया जा रहा। खंडपीठ ने कलक्टर को कहा कि यदि स्थितियां बेहतर नहीं कर सकते, तो कोर्ट को मजबूरन मुख्य सचिव को बुलाना पड़ेगा।

एक दूसरे पर न डालें जिम्मेदारी

मंडोर उद्यान के बाहर अतिक्रमण हटाने की बात आई तो जेडीए के अधिवक्ता ने नगर निगम की जिम्मेदारी बताई, लेकिन अगले ही पल उन्होंने कहा कि आपसी समन्वय से अतिक्रमण हटाएंगे। कोर्ट ने कहा, इस शहर की यही विडंबना है कि जब भी किसी सुधार की बात कही जाती है, तो विभाग एक दूसरे पर जिम्मेदारी डालकर बचना चाहते हैं। कोई काम नहीं करना चाहता।
लाइटें क्यों लगाई, कचरा दिखाने के लिए

कोर्ट में जब बताया गया कि उद्यान में हाल ही 30 लाइटें लगाई गई है, इस पर खंडपीठ ने कहा कि शायद उद्यान का कचरा दिखाने के लिए लाइटें लगाई गई हैं। हालांकि, कोर्ट ने कहा कि लाइटें, सौंदर्यीकरण के साथ-साथ सफाई और हरियाली की सारसंभाल भी उतनी ही जरूरी है। खंडपीठ ने कहा कि उद्यान को संवारने के प्रयास नाकाफी है और इस संबंध में शनिवार को विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए जाएंगे।