
परिवारों में भय का माहौल: फोटो पत्रिका
जोधपुर। पर्यावरण संतुलन के महत्वपूर्ण घटक वनभूमि का जोधपुर में लगातार अस्तित्व खत्म होता जा रहा है। पिछले दो दशक के दौरान वनभूमि पर अंधाधुंध अतिक्रमण और खनन पर अंकुश लगाने के लिए वनविभाग अथवा जिला प्रशासन की ओर से एक भी बड़ी कार्रवाई नहीं की गई।
राजस्थान पत्रिका ने जोधपुर जिले के उपवन संरक्षक नरेन्द्रसिंह शेखावत ने इस बाबत सवाल किए तो उनका कहना था कि वनभूमि के नक्शों के अभाव, सीमा स्तंभ, मुटाम सहित कुछ तकनीकी खामियों के चलते यह संभव नहीं हो पाया। यही कारण थे कि जोधपुर जिले में वनभूमि पर अतिक्रमण एक बड़ी चुनौती बन गया है। डीएफओ ने बताया कि जोधपुर शहर के विभिन्न वनखण्डों की करीब 210.43 हेक्टेयर वनभूमि पर कब्जे है। इस पर 9,526 अतिक्रमणकारियों को नोटिस जारी किए गए हैं। इन अतिक्रमणकारियों को हटाने के लिए वनविभाग ब्लू प्रिंट तैयार कर रहा है। सहीं वक्त आने पर इसका खुलासा किया जाएगा।
जिला प्रभारी मंत्री मदन दिलावर ने बताया कि वन विभाग की भूमि पर अतिक्रमण मामलों में न्यायालय परिस्थितियों के आधार पर रियायत भी देता है और संबंधित विभाग को भूमि सौंपने के निर्देश जारी करता है। वर्षों से बसे लोगों की स्थिति को देखते हुए प्रशासन निर्णय करेगा और जरूरत पड़ने पर पुनर्वास की व्यवस्था भी की जा सकती है।
मगजी की घाटी मोहल्ला विकास समिति के अध्यक्ष भोपाल सिंह ने कहा कि क्षेत्र में पांच हजार से अधिक परिवार अकाल के समय क्षेत्र की पत्थर की खानों में मजदूरी के लिए आकर बसे थे। भूमिहीन परिवारों के पास अब रहने का कोई दूसरा विकल्प नहीं है। ऐसे में अपने बच्चों को लेकर कहां जाएंगे। प्रशासन को पहले इनके पुनर्वास के बारे में सोचना चाहिए।
प्रशासन की सख्ती के बीच मानवीय पहलू भी उतना ही गंभीर है। मंडोर मगजी की घाटी क्षेत्र में रहने वाले अधिकांश परिवार भय और अनिश्चितता के साये में हैं। स्थानीय निवासी कुंदनपुरी का कहना है कि 20 साल से यहीं रह रहे हैं, अब पूरा परिवार लेकर कहां जाएं? वहीं सोनाराम भील जैसे मजदूरों का दर्द और गहरा है।
उनका कहना है कि बड़ी मुश्किल से गुजर-बसर कर रहे हैं, अगर यहां से हटाया गया तो जीवन कैसे चलेगा?' सिलिकोसिस से पीड़ित भीखाराम का कहना है कि घर उजड़ा तो परिवार सड़क पर आ जाएगा। क्षेत्र में बसे सभी परिवारों की मांग है कि यदि सरकार जमीन खाली कराना चाहती है तो पहले पुनर्वास की व्यवस्था सुनिश्चित करे। उनका कहना है कि बिना वैकल्पिक व्यवस्था के बिजली-पानी काटना उन्हें मूलभूत अधिकारों से वंचित करना होगा।
Published on:
20 Mar 2026 03:02 pm
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