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साल 2020 के ‘सावों’ में धूम मचाएंगे 500 वैरायटी के जोधपुर साफे, देश-विदेश में बढ़ी डिमांड

मारवाड़ में हर खुशी और गम के साथ मौसम और माह के अनुरूप साफा पहनने का प्रचलन रहा है। सावन हो फाल्गुन या फिर आषाढ़। हर मास में अलग-अलग पगड़ी के रंगों को पहनने की परम्परा है। इसके पीछे भी कई वैज्ञानिक कारण हैं।
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साल 2020 के ‘सावों’ में धूम मचाएंगे 500 वैरायटी के जोधपुर साफे, देश-विदेश में बढ़ी डिमांड

नंदकिशोर सारस्वत/जोधपुर. वर्ष २०२० का प्रथम ‘सावा’ (विवाह मुहूर्त) १५ जनवरी से शुरू होकर मार्च के द्वितीय सप्ताह तक रहेगा। इस बार भी सावों के सीजन में जोधपुरी साफे मारवाड़ सहित देश विदेश में धूम मचाएंगे। इस बार वैवाहिक सीजन में दूल्हे के साथ बारातियों के लिए पचरंगी, सतरंगी, गजशाही, बनारसी, सिल्क, कॉटन और मल्टी कलर फ्लावर बारीक बंधेज सहित ५०० से अधिक वैरायटी के साफे बाजार में हैं। मेजबान और मेहमान शादी में लीक से हटकर पहनावे की तैयारियों में जुट गए हैं। रंग, कपड़े और डिजाइन के अनुसार जोधपुरी साफे की कीमत दो सौ रुपए से पांच हजार तक है। वेडिंग सीजन के लिए साफा व्यवसायी मांग के अनुरूप तैयारियों में जुटे हैं।

साफा पहनने के पीछे वैज्ञानिक कारण
मारवाड़ में हर खुशी और गम के साथ मौसम और माह के अनुरूप साफा पहनने का प्रचलन रहा है। सावन हो फाल्गुन या फिर आषाढ़। हर मास में अलग-अलग पगड़ी के रंगों को पहनने की परम्परा है। इसके पीछे भी कई वैज्ञानिक कारण हैं। सभी गहरे रंग जो पसीने से खराब हो सकते हैं शीतकाल में और सभी हल्के रंग गर्मी में पहने जाते हैं। चैत्रमास में गुलाबी रंग, वैशाख में जवाई रंग, ज्येष्ठ में फूल गुलाबी, आषाढ़ में आभाशाही, श्रावण मास में लहरिया-केसरिया, भाद्रपद मास में मलयागिरि, आश्विन मास में लाल या कसुमल, कार्तिक मास में सिन्दूरिया, मार्गशीर्ष-मोळिया, पौष मास में तोरीफूला और हल्का केसरिया, माघ मास में केसरिया और फाल्गुण-फागुनिया रंग के साफे पहने जाते हैं। मार्गशीर्ष पौष मास के दौरान मारवाड़ में मोळिया, बसंत ऋतु में गुलाबी साफे का प्रचलन है। अक्षय तृतीया को केसरिया पगड़ी और दीपावली पर मोर गरदनी चूंदड़ी, रक्षाबंधन पर मोठड़ा, होली पर फागुनिया पहनने का रिवाज रहा है।

राजस्थानी संस्कृति की खास पहचान

पाग-पगडि़यां भारतीय संस्कृति खासकर राजस्थान का प्रमुख अंग रही है। किसी व्यक्ति जाति, राष्ट्र आदि की वे सब बातें जो उसके मन की रुचि, आचार विचार कला कौशल और सभ्यता के क्षेत्र में बौद्धिक विचार आदि की बातें संस्कृति शब्द में निहित है। समाज विशेष और संस्कृति सभ्यता की पहचान कराने वाली पाग पगडि़यों का वर्तमान स्वरूप बदलता जा रहा है।

भारत महोत्सव से मिली नई पहचान
न्यूयार्क में सन १९८६ में आयोजित भारत महोत्सव में भारत की अनेक एेतिहासिक महत्व की वस्तुओं को प्रदर्शनी के लिए भेजा गया था उसमें जोधपुर के मेहरानगढ़ से डॉ. महेन्द्रसिंह नगर की ओर से संग्रहित पाग पगडि़यों के प्रदर्शन ने मारवाड़ की संस्कृति को नई पहचान दी। वर्ष १९८७ में ४ मई से ११ मई तक स्विट्जरलैण्ड के छह प्रमुख शहरों में आयोजित भारत महोत्सव के दौरान भी पाग पगडि़यों ने मारवाड़ की पाग पगडि़यों को नई ऊंचाइयां बख्शी थी।

१४ से २० मीटर होती है पाग
मलमल फाडक़र पाग बनाई जाती है। इसकी लंबाई करीब १४ से २० मीटर तक तथा चौड़ाई ६ से ८ इंच तक होती है। कभी-कभी दो पागे एक साथ बांधी जाती है इसे दोवड़ी पाग कहते हैं। इसके अंतिम छोर पर छैला बाद में सिलकर लगाया जाता है।

सेलिब्रिटीज में जोधपुरी साफा पहली पसंद
राजनेताओं, अभिनेताओं और खेल की दुनिया से जुड़ी सेलिब्रिटीज में जोधपुरी साफा पहली पसंद बना हुआ है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जोधपुरी गजशााही साफा पहने ७३ वें स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से देश को संबोधित कर चुके है। पगडी बांधने की कला को देश-विदेश के कोने-कोने तक पहुंचाने में जुटे मंडोर निवासी डॉ. अशोक गहलोत के पास मेवाडी पगडी, जूनागढ की गोटेदार पगडी, भंगडा पाग, विभिन्न सभ्यताओं के सेठो की पाग, राव चूंडा की नकल पर बनाई गई पगडी, महाराष्ट्रीयन पगडी, धौलपुरी पाग, चौबेदारो की पाग, बीकानेरी पाग, गुजराती पाग आदि कई प्रकार के कलेक्शन है, जो सभ्यता और समाज विशेष की पहचान कराते है। अब तक उनकी ओर से ३५ देशों में साफा भेजा जा चुका है।

बॉलीवुड स्टार पहनते हैं जोधपुर पाग
सैकड़ों बॉलीवुड स्टार को अपने हाथ से बनाई खास तरह की पगडिय़ां पहना चुके डॉ. गहलोत ने बताया कि चुनावी सीजन में विभिन्न राजनीतिक दलों की ओर से पार्टी के चुनाव चिह्न और ध्वज के अनुरूप साफों की मांग रहती है। साफा व्यवसायी विकास परिहार ने बताया कि तीन दशक पूर्व लुप्त हो रही साफे की परम्परा में अब धीरे-धीरे बदलाव आने लगा है। चूंदड़ी, गोल साफा, पगड़ी, प्रिंटेड, लहरिया पल्ला, ब्रॉड प्रिंट में सैकड़ों वैरायटियों के प्रति देश विदेश में क्रेज बढ़ा है।