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अब जटिल इलाज के लिए जोधपुर एम्स में मिलेगी अमरीका जैसी सुविधा, विशेषज्ञों ने जानी तकनीक

नेत्र रोग विभाग की कॉन्फ्रेंस में पहुंचे विशेषज्ञों ने साझा किए अनुभव

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जोधपुर/बासनी. अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में रविवार को नेत्र रोग विभाग की ओर से मोतियोबिंद पर एक दिवसीय राज्य स्तरीय कॉन्फ्रेंस में ५ मरीजों की एविडिएंश बेस्ड (वैज्ञानिक आधार) लाइव सर्जरी की गई। इसमें मरीजों की खराब कॉर्निया, हार्ड मोतिया की एडवांस तकनीक से ऑपरेशन कर समझाया गया। वरिष्ठ चिकित्सकों ने मशीनों के माध्यम से मरीजों पर अलग-अलग लैंस को काम में लेते हुए फेको पद्धति से ऑपरेशन कर पीजी के स्टूडेंट्स को नई तकनीकी बताई।

माउंट आबू से आए नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. सुधीर सिंह ने बताया कि अमरीका में जिस तकनीक से आंख के ऑपरेशन होते हैं, वैसे ही ऑपरेशन यहां जोधपुर में किए जा सकते हैं। यहां से बाहर जाने की जरूरत नहीं है। अमरीका में फोल्डलेवल लैंस द्वारा की जाने वाली फेको पद्धति से कैडरेक्ड सर्जरी यहां भी की जा सकती है। उदयपुर मेडिकल कॉलेज के नेत्र रोग विभाग के अध्यक्ष डॉ. अशोक बैरवा ने बताया कि कोई भी प्रोसिजर जटिल नहीं होता है, सही तकनीक को प्रयोग में लाते हुए चिकित्सक किसी भी जटिल ऑपरेशन को आसान बना सकता है। आयोजन के अध्यक्ष डॉ. अरविन्द मौर्या ने बताया कि कॉन्फ्रेंस में डॉ. रतन पुरोहित को लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार से नवाजा गया। पेपर प्रजेंटेशन में सीनियर रेजिडेंट डॉ. साहिल भंडारी को स्वर्ण पदक के रूप में जीएल मौर्या अवॉर्ड दिया। वहीं डॉ. वर्षा वाष्र्णेय को सिल्वर मैडल और डॉ. पूजा को कांस्य पदक दिया गया।

हड़ताल के लिए सरकार और चिकित्सक दोनों जिम्मेदार

कॉन्फ्रेंस में आए चिकित्सकों से राज्य में वर्तमान में सेवारत चिकित्सकों की हड़ताल को लेकर सवाल पूछे गए। इस पर चिकित्सकों ने कहा कि ये स्टेप काफी दुखद है, लेकिन इसके लिए सरकार भी जिम्मेदार है। डॉ. संजीव देसाई ने कहा कि कोई भी चिकित्सक नहीं चाहता है कि वे हड़ताल पर जाएं, लेकिन सरकार उनकी जायज मुद्दों को लेकर उदासीनता दिखा रही है। चिकित्सक २४-२४ घंटे काम करते हैं। रेजिडेंट्स पर तो और भी ज्यादा जिम्मेदारी रहती है। चिकित्सक मरीज की जान बचाते हैं उनकी जायज मांगों पर सरकार को ध्यान देना चाहिए। गांवों में सीएचसी और पीएचसी में टूटे फुटे कमरे और आधे अधूरे संसाधनों के बीच मरीज को इलाज से संतुष्ट कर पाना असंभव है। इस तरह की विषम परिस्थितियों के बावजूद भी चिकित्सक अपनी ड्यूटी निभाते हैं।