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कोरोनाकाल में घायल वन्यजीवों का ‘मसीहा बना महेन्द्र

सवा साल से घर-परिवार व मित्रों से दूरी बनाकर 24 घंटे दिन रात जुटा है घायल वन्य प्राणियों की सेवा में  
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कोरोनाकाल में घायल वन्यजीवों का 'मसीहा   बना महेन्द्र

कोरोनाकाल में घायल वन्यजीवों का 'मसीहा बना महेन्द्र

जोधपुर. संभाग के एकमात्र वन्यजीव चिकित्सालय में सेवारत महेन्द्र विगत सवा साल से कोरोनाकाल में २४ घंटे दिन रात घायल वन्यजीवों की सेवा में जुटा है। घायल वन्यजीवों को कोरोना संक्रमण से बचाने के लिए उसने बिना अवकाश लिए घर-परिवार यहां तक मित्रों से भी पूरी तरह दूरी बनाकर रखी है। कायलाना रोड स्थित माचिया जैविक उद्यान का परकोटा ही विगत सवा साल से महेन्द्र की दुनियां बनी हुई है। उसके दिन की शुरुआत ही वन्यजीवों के स्वास्थ्य की जानकारी से शुरू होती है। वन्यजीव चिकित्सालय में कार्यरत स्टाफ से कोविड प्रोटोकॉल की पालना करवाना, सभी उपचाराधीन वन्यजीवों को उसकी प्रजातिनुसार भोजन, दाना खिलाना, स्वस्थ होने के बाद वन्यजीवों को पुन: प्राकृतवास में छोडऩा दिनचर्या का हिस्सा है। वन विभाग संचालित रेस्क्यू सेंटर व माचिया बायोलॉजिकल पार्क में वर्ष 2013 से बतौर संविदाकर्मी के रूप में वन्यजीव चिकित्सा सहायक के पद पर सेवारत महेन्द्र गहलोत ने पत्रिका से बातचीत में बताया कि घायल वन्यजीवों से इतना जुड़ाव है कि अवकाश लेने का मन ही नहीं करता है। रेस्क्यू सेंटर में कोविडकाल में पांच घायल दुर्लभ तिलोर पक्षियों (होबारा बस्टर्ड) और जोधपुर जिले के बावरला से रेस्क्यू किए पांच घायल भेडि़ए, फ्लेमिंगो आदि भी महेन्द्र के नियमित देखभाल के कारण अब पूर्ण स्वस्थ है। जिले के राजासनी मथानिया के साधारण कृषक परिवार में जन्में महेन्द्र ने एशियाटिक लॉयन शावक कैलाश, रियाज और अनाथ तेंदुए के शावक नाणा-बेड़ा, मादा पैंथर सोनू के पालन-पोषण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वरिष्ठ वन्यजीव चिकित्सक डॉ. श्रवण सिंह राठौड़ के सानिध्य में विभिन्न प्रजातियों के वन्यजीवों के उपचार व रेस्क्यू करने का प्रशिक्षण प्राप्त कर विभागीय आदेशों के तहत वन विभाग के विभिन्न डिवीजनों के फील्ड स्टाफ को ट्रेक्यूलाइजिंग व रेस्क्यू करने की तकनीक व घायल वन्यजीव का प्राथमिक उपचार का प्रशिक्षण भी दे रहे है।

कोविडकाल में पहुंचे घायलों में 35 प्रतिशत रिकवरी कोरोना काल में वन्यजीव चिकित्सालय में 25 मार्च 2020 से 20 मई 2021 तक कुल 1755 घायल वन्यजीव लाए गए जिसमें चिंकारे, काले हरिण सहित कई दुर्लभ पक्षी, सरिसृप, व जलीय पक्षी शामिल है। इनमें 30 से 35 प्रतिशत घायल वन्यजीवों पूर्ण रूप से स्वस्थ होने पर स्वतंत्र विचरण के लिए प्राकृतवास में छोड़ा गया।