जब अमृता ने साहिर के शेर गुनगुनाते हुए इमरोज की पीठ पर 'साहिर' लिखा

जब अमृता ने साहिर के शेर गुनगुनाते हुए इमरोज की पीठ पर 'साहिर' लिखा
Mein tumhein phir miloongi play staged beautifully

MI Zahir | Updated: 23 Sep 2019, 08:56:13 PM (IST) Jodhpur, Jodhpur, Rajasthan, India

क्लासिकल नाटक 'मैं तुम्हें फिर मिलूंगी' ( Mein tumhein phir miloongi drama ) में अमृता ( Amrita Pritam ), साहिर लुधियानवी

( Sahir Ludhianvi ) और इमरोज ( painter imroz ) की यादें ताजा

जोधपुर के कलाकारों की अलवर में पेशकश

 

 

 

 

 

जोधपुर.मशहूर शाइर साहिर लुधियानवी ( Sahir Ludhianvi ) के मुंबई जाने के बाद तन्हा उपन्यासकार अमृता प्रीतम ( Amrita Pritam ) की चित्रकार इमरोज ( painter imroz ) से दोस्ती होती है। दोनों में घनिष्ठता हो जाती है और एक रोज वह इमरोज की पीठ पर बड़े प्यार से 'साहिर' लिखती हैं। वे साहिर के शेर गुनगुनाती हैं। यह रंगबाज थिएटर ( Rangbaaz Theater ) की ओर से अलवर के इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियरिंग में आयोजित समारोह में मंचित नाटक का भावपूर्ण दृश्य था, जिसका दर्शकोंं ने खूब आनंद लिया।
प्रेम की अनूठी अनुभूति

इस नाटक में यह दिखाया गया कि अमृता प्रीतम का साहिर लुधियानवी के साथ यह प्यार आसमां की तरह था, लेकिन इमरोज का प्यार इंद्रधनुषी छत की तरह। साहिर की शाइरी से सजे मैं तुम्हें फिर मिलूंगी ( Mein tumhein phir miloongi ) क्लासिकल नाटक ने पंजाबी लेखिका अमृता प्रीतम और उर्दू शाइर साहिर लुधियानवी के साथ-साथ चित्रकार इमरोज के प्रेम की ऐसी ही कुछ अनुभूति कराई।

तन्हाई की दर्द भरी अनुगूंज
जोधपुर के वरिष्ठ साहित्यकार व चिंतक कवि डॉ. रामप्रसाद दाधीच लिखित व रंगकर्मी डॉ. एस पी रंगा निर्देशित इस नाटक में संदेश प्रतिध्वनित हुआ कि एक बेबाक और अपनी शर्तों पर जीने वाली औरत को आसमां की उन्मुक्तता और छत की सुरक्षा दोनों की आवश्यकता होती है। इस नाटक ने दर्शकों का न केवल एक रूहानी सफर के साथ आत्मिक आनंद से साक्षात्कार करवाया, बल्कि संदेश दिया कि साहिर और अमृता प्रीतम को जानना हो तो उनके रचना कर्म में झांकना होगा और उनकी तन्हाई की दर्द भरी अनुगूंज सुननी होगी।

पर्दे पर रचा शाहकार

इसमें अनुराधा आडवाणी ( Anuradha Advani ) ने अमृता प्रीतम, डॉ. एसपी रंगा ( S P Ranga ) ने साहिर लुधियानवी, मजाहिर सुल्तान जई

( Mazahir sultan zai ) ने इमरोज के रूप में भाव और संवादों की जुगलबंदी से सजी शानदार अदाकारी की। वहीं हितेंद्र गोयल सरदार मोहनसिंह की भूमिका में खूब जमे। पेशकश में उर्दू के क्लिष्ट उच्चारण के लिए किया गया अभ्यास भी झलका। वहीं सुधांशु मोहन-नवराज, डॉ. नीतू परिहार-उमा त्रिलोक ने पूरा-पूरा न्याय किया।

पर्दे के इतर
संगीत मोहित परिहार का था। लाइट रमेश भाटी की थी तो प्रस्तुति नियंत्रक अरुण पुरोहित थे और रंगकर्मी शब्बीर हुसैन ( shabbir hussain ) व सईद खान ( Saeed Khan ) ने सहायक की भूमिका निभाई।

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