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यह है खासियत जोधपुर के सबसे प्रतापी राजा राव मालदेव के देवल की

मारवाड़ राज्य का सबसे अधिक विस्तार करने वाला राजा

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यह है खासियत जोधपुर के सबसे प्रतापी राजा राव मालदेव के देवल की

यह है खासियत जोधपुर के सबसे प्रतापी राजा राव मालदेव के देवल की


जोधपुर/मंडोर . मंडोर उद्यान में राव मालदेव के देवल का निर्माण जोधपुर के प्रतापी शासक राव मालदेव के पांचवे पुत्र मोटाराजा उदयसिंह ने संवत् 1647 में करवाया था। यह छतरी शिखरबद्ध है। इसके मण्डोवर भाग पर चारों ओर देव प्रतिमाओं की ताकें है लेकिन उन तांकों पर देव प्रतिभाएं विद्यमान नहीं है। गर्भगृह में भी कोई प्रतिमा नहीं है। गर्भगृह के द्वार खण्डों पर गंगा यमुना अपने वाहनों सहित स्थानक मुद्रा में अवस्थित है। इस देवल का वितान समतल है। गर्भगृह के द्वार खण्ड पर एक शिलालेख उत्र्तीण है, जिसमें इस देवल के निर्माण की जानकारी मिलती है। स्थापत्य की दृष्टि से मध्यम लेकिन भव्य एवं साधारण निर्माण के कारण यह छतरी अपना अलग महत्व रखती हैं । राव मालदेव एक प्रतापी एवं निर्भय राजा थे। उन्होंने अपने राज्यकाल में मारवाड़ को बीकानेर तक बढाया था तथा अनेक गढ़ों, किलों का निर्माण भी करवाया था। जोधपुर शहर पनाह का निर्माण भी इसी प्रतापी शासक की देन है।

मारवाड़ राज्य का सबसे अधिक विस्तार करने वाला राजा

जोधपुर नगर के संस्थापक राव जोधा के बाद उनके पुत्र क्रमश: राव सातल ,राव सूजा और राव गांगाजी जोधपुर की गद्दी पर बैठे। राव गांगा का पुत्र मालदेव वि.ं 1589 (ई. 1532) में जोधपुर का स्वामी हुआ। जोधपुर के राजाओं में मालदेव सबसे प्रतापी राजा हुए हैं उन्हीं के समय में मारवाड़ राज्य का सबसे अधिक विस्तार हुआ था। इनके पास बड़े-बड़े वीर तथा कुशल सेनापति थे जिनमें मुख्य कूंपा, जेता, पंचायण, चांदा मेड़तिया व नगा भारमलोत आदि थे। बादशाह हूमायूँ जब शेरशाह सूरी से हारकर भागा तब मालदेव ने उसे मदद देने को कहलाया था। इससे नाराज होकर शेरशाह ने मारवाड़ पर बहुत बड़ी सेना लेकर चढ़ाई की, परन्तु मालदेव ने भी एक विषाल सेना एकत्रित कर ली थी। दोनों सेनाओं के गिरी और सुमेल में पड़ाव हुए। मालदेव की शक्ति देखकर शेरशाह की उस पर हमला करने की हिम्मत नहीं हुई। एक माह तक दोनों सेनाएं मुकाबले के लिए आमने-सामने पड़ी रही। मालदेव की मृत्यु के बाद उसकी इच्छा के अनुसार उसका छोटा पुत्र चन्द्रसेन जोधपुर राज्य का स्वामी बना। यह बड़ा स्वतंत्राप्रेमी तथा वीर था। इसने मुगलों से कई भीषण युद्ध किये और अकबर की अधीनता स्वीकार नहीं की। महाराणा प्रताप की तरह यह भी जीवन भर मुगलों से युद्ध करता रहा परन्तु अकबर की विशाल सेना के आगे वह जोधपुर को नहीं बचा सका। मुगलों के अधिकार में जोधपुर जाने के बाद वह सिवाना की ओर चला गया और जीवन्त पर्यन्त पहाड़ों पर रहते हुए शत्रुओं से लड़ता रहा।