14 जनवरी 2026,

बुधवार

Patrika LogoSwitch to English
home_icon

होम

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

मंडोर उद्यान हरा-भरा करने वाले प्राचीन जलस्रोत बदहाली के कगार पर

पानी के अभाव में उजड़ रहा उद्यान, जेट फव्वारा भी तीन साल से पड़ा है बंद

4 min read
Google source verification
मंडोर उद्यान हरा-भरा करने वाले प्राचीन जलस्रोत बदहाली के कगार पर

मंडोर उद्यान हरा-भरा करने वाले प्राचीन जलस्रोत बदहाली के कगार पर

जोधपुर/मंडोर. रेत को भी समझ लिया पानी, हाय क्या चीज प्यास होती है। सूखे हलक, प्यास की शिद्दत और पानी क ा मोल प्यासी मरुधरा और विशेषकर थार के लोगों से ज्यादा और कौन जान सकता है। सूरज के शहर जोधपुर की धरा महत्वपूर्ण व विविधताओं से भरी निराली जमीन है। यहां के सांस्कृतिक, सामाजिक और धार्मिक जीवन ने जहां कई विषम परिस्थितियों से संघर्ष कर अपनी अस्मिता सुदृढ़ रखी तो दूसरी ओर अकाल, अन्न और जल आदि के संकट झेल कर साहस का परिचय दिया है। शहर में क्लोजर के दिनों में पानी की अहमियत और भी अधिक पता चल रहा है। ऐसे में हमें अपनी परंपरागत धरोहर कुएं और बावडिय़ां याद हो आते हैं।

करीब 82 एकड़ क्षेत्र में फैले सदियों पुराने मंडोर उद्यान में अशोक वृक्षों की दीर्घ पंक्तियों, दूब के लंबे चौड़े मैदान, बोगनवेलिया की कतारें और भीमकाय वृक्ष पनपाने में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले पानी के जलस्रोत आज तबाही के कगार पर हैं। मंडोर उद्यान में करीब दस से अधिक कुओं और बावडिय़ों में से अधिकतर का वजूद खत्म हो चुका है। उद्यान कितना पुराना है, यह तो ठीक से नहीं कहा जा सकता है, लेकिन राजा मालदेव के समय सन 1532 से 1572 के समय मंडोर उद्यान मौजूद था। इतिहास में इसका पूरा उल्लेख मिलता है। --
पानी उपलब्ध, लेकिन सरकारी उदासीनता

मंडोर उद्यान के पेड़ सूख रहे हैं। पिछले पांच दशक के दौरान सरकार की ओर से उद्यान में एक भी पौधा नहीं लगाया गया। पानी की प्रचुर मात्रा में उपलब्धता के बावजूद उद्यान में तीन साल से जेट फव्वारे बंद पड़े हैं। सैलानियों का मोह भंग हो रहा है। उद्यान में मौजूद प्राचीन जलस्रोतों की नियमित देखरेख नहीं होने के कारण कई कुएं ***** कर बंद किए जा चुके हैं। ये सभी कुएं मंडोर पहाडिय़ों में स्थित प्राकृतिक नागादड़ी जलाशय से भरते थे। वर्तमान में कुओं पर लगे सरकारी पंप में से ये एक दो ही कार्यरत हैं।

मण्डोर उद्यान में स्थित बावडिय़ां व कुएं

1. झाला जी की बावड़ी
इस कुएं में कुछ दूरी तक सीढिय़ां लगी हुई थीं, जो दोनों दिशाओं (उत्तर-दक्षिण) से उतर कर अन्दर की पूर्व की दिशा की तरफ जाती थीं। बाद में गहरा कुआं आ जाता है, इसलिए लोग इसे बेरा व बावड़ी दोनों ही कहते हैं। इस पर पूर्व में रहट लगी हुई थी, जिससे पूरा मंडोर बगीचे को पानी पिलाया जाता था। इस अरहट पर सिर्फ एक बैल जोता जाता था, जिससे यह सिद्ध होता है कि इस कुएं के पानी का स्तर बहुत ऊपर था।

2. काला गोरा भैरू जी की बावड़ी

यह बावड़ी बहुत पुरानी है। इसकी संवत 1776 में महाराजा अजीतसिंह ने मरम्मत कराई थी। यह बावड़ी आज भी अच्छी हालत में है और इसका पानी पीने योग्य, साफ व मीठा है। इस बावड़ी का पानी काला गोरा भैरू दर्शन के लिए आने वाले श्रद्धालु प्रयुक्त करते हैं।
कुएं

1. महादेवजी वाला बेरा :
इस कुएं को महादेवजी के मंदिर के निर्माण के बाद 'महादेवजी वाला बेराÓ कहा जाने लगा। इस कुएं का संचालन करने वाले व्यक्ति इसके आसपास जामफ ल (अमरूद) का बगीचा लगाते थे। इसलिए इसका नाम 'जामफ ल वाला बेराÓ हुआ। इस कुएं को एक जुलाई 1936 को लोहे की जाली से बंद कर दिया गया था। उसके बाद जब इस उद्यान का दुबारा विकास हुआ तो इसे पाट कर दूब का प्लांट कर दिया गया व पास में वापस शिलालेख लगा दिए गए। अब इस कुएं का कोई नामोनिशान नहीं है।

2. नारंगी वाला बेरा
इस कुएं से नारंगियों का बगीचा पिलाया जाता था। इसलिए इसका नाम नारंगी वाला बेरा हुआ। सन् 1936 में इस कुएं पर भी जाली लगाई गई थी। उसके बाद इस कुएं पर एक पम्प भी लगाया गया। इस कुएं का पानी दो दशक पहले तक मंडोर उद्यान में काम में लिया जाता था।

3. मोती बेरा

पूर्व में इस कुएं पर अरहट लगस हुआ था और नालियां भी बनी हुई थी। यह कुआं बहुत पुराना है, जिससे बगीचा पिलाया जाता था। उस समय यहां पर गुलाब के बहुत से पौधे थे और दूब का कोई प्लांट नहीं था। इस कुएं में बहुत पानी था, लेकिन अब कम हो गया है। क्योंकि इस कुएं में सफ ाई नहीं होने व कचरा पडऩे के कारण इसके सिरे बंद हो गए। कुछ वर्ष पूर्व यहां पर पम्प लगा हुआ था, जिससे बगीचे को पानी दिया जाता था। अब इस कुएं से पम्प हटा लिया गया है और इसका पानी काम में नहीं लिया जा रहा है। अगर इस कुएं की सफ ाई की जाए तो इसका पानी काम में लिया जा सकता है।

4. बड़ा बेरा
यह कुआं नागादड़ी के ओटे की नहर में आया हुआ है। यह कुआं बहुत बड़ा है। इसके पास हौज बना हुआ है। संवत 1956 में जब जोधपुर मे भयंकर अकाल पड़ा और पीने के पानी की कमी हो गई। तब इस कुएं से सूंडियों से पानी खींच कर पास वाले हौज में डाला जाता था। वहां से पम्प कर के इसका पानी पहाड़ी पर चढ़ाया जाता था। वहां से पानी गुलाब सागर की नहर में एक पक्का व बंद नाला गुलाबसागर के बच्चे तक निर्माण कर उसका पानी गुलाबसागर के बच्चे की खेळियों में डाला जाता था, जहां से जनता घड़े में पानी भर कर ले जाती थी। पूर्व में इस कुएं पर पम्प लगा हुआ था, लेकिन अब यहां पर पम्प नहीं है और यह कुआं कचरे से भरा पड़ा है। इस कुएं की सफ ाई कर यदि पम्प लगाया जाए तो पेयजल संकट में यह क्षेत्रवासियों के लिए मील का पत्थर साबित हो सकता है।


5. मण्डोर नर्सरी का बेरा

नर्सरी कुएं पर चार इंच की पाइप लाइन संचालित करने के लिए बड़ा पम्प लगा हुआ है, जिससे नर्सरी व बगीचा पिलाया जाता है।

6. मसानिया बेरा

इस कुएं का नाम मसानिया बेरा है। क्योंकि माली समाज के श्मशान के पास स्थित होने के कारण इसका यह नाम रखा गया है। इस कुएं पर पूर्व में 75 अश्व शक्ति का बड़ा पम्प लगा कर जेट फ व्वारा संचालित होता था, लेकिन यह तीन साल से खराब पड़ा होने के बाद इसकी कोई सुध नहीं ले रहा है।