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क्या आपको मालूम है जोधपुर में भी बहती है गंगा, जी हां श्रद्धालु यहां लगाने आते हैं आस्था की डुबकी

प्राकृतिक जलधारा से सूर्यनगरीवासियों की जुड़ी है विशेष आस्था  

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मंडोर/जोधपुर. सूर्यनगरी के विभिन्न क्षेत्रों में स्थित आस्था के केंद्र अद्भुत इतिहास सहित रोचक कहानियों और जानकारियों से लबरेज हैं। ऐसा एक स्थान है जिसके लिए कहा जाता है कि यहां से साक्षात गंगा बहती है। मरुक्षेत्र में पानी के महत्व को देखते हुए यह स्थान आज भी जोधपुर के प्रमुख धार्मिक स्थलों में प्रमुख आस्था स्थल माना जाता है। मंडोर स्थित बेरी गंगा से बह रही प्राकृतिक जलधारा श्रद्धालुओं को वर्षों से श्रद्धा के धागे में पिरोए हुए हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इसका अस्तित्व 5500 वर्ष का माना जाता है। कहा जाता है कि यहां शिवलिंग और भैरु की मूर्ति सहित गंगा का अवतरण हुआ था। बाद में यह स्थान लोप हो जाने से सैंकड़ो सालों तक गुप्त रहा।

स्कंद पुराण में भी इसका उल्लेख होने की बात सुनने में आती है। पहाडिय़ों से निकल रही प्राकृतिक जलधारा से बहुत सी मान्यताएं जुड़ी हैं। कहा जाता है कि एक बार साहूकार ने भूलवश गोवंश की हत्या कर दी थी। उसके पश्चाताप के लिए ब्राह्मणों ने गंगा के अवतरण होने पर ही पाप की मुक्ति का मार्ग बताया था। इस कारण साहूकार और उसकी पत्नी ने पहाडिय़ों में वर्षों तक जप-तप करने से गंगा की जलधारा प्रवाहित हुई थी और फिर यह धार्मिक केंद्र बन गया। बेरी गंगा के प्रमुख मंदिर में स्थापित भैरु की मूर्ति से ही गंगा का प्रवाह निकलने की मान्यता है। कहा जाता है कि यहां कभी पानी नहीं सूखता। पास ही स्थित बेरा क्षेत्र में भी श्रद्धालु आस्था की डूबकी लगाने आते हैं।

गोशाला का हो रहा संचालन


वर्तमान में बेरी गंगा श्रीमाली ब्राह्मणों के अधीन है। महंत सुरेश ओझा ने बताया कि करीब सौ वर्ष पूर्व उनके दादा महंत मोहनलाल ओझा ने आकर सार-संभाल की और तब से उनका परिवार ही यहां स्थापित नीलकंठ महादेव मंदिर की देखरेख कर रहा है। श्रीमाली ब्राह्मणों की ओर से संचालित ट्रस्ट इसका संचालन कर रहा है। पास ही पंडित दीनदयाल उपाध्याय गोशाला भी संचालित हो रही है। इसमें करीब 450 गाएं हैं।

मेलों में उमड़ता है सैलाब

अधिकमास में भौगिशैल परिक्रमा के दौरान यहां मेले का आयोजन होता है। गंगा दशमी, श्रावण मास की हरियाली अमावस्या और कार्तिक पूनम को भी मेला भरता है। विभिन्न मान्यताओं के चलते यहां श्रद्धालु शीश नवाने आते हैं।

बारिश में झरने प्रसिद्ध


पहाडिय़ों की विशेष बनावट यहां के दृश्य को और विहंगम बना देती हैं। भू वैज्ञानिकों के अनुसार यहां पहले समुद्र होने के कारण इन पहाडिय़ों की ऐसी बनावट है। श्रद्धालुओं का मनाना है कि भगवान श्रीराम द्वारा छोड़े गए तीर से यहां स्थित समुद्र सूखने से यह स्थान प्रकट हुआ था। बारिश के मौसम में यहां बहने वाले झरने खासे प्रसिद्ध हैं। लोग इन झरनों में स्नान करने का आनंद उठाने यहां आते हैं। बरसात में यह स्थान अधिक लुभावना लगता है।