
निरक्षर मां के आदेश पर बना दिया बालिकाओं के लिए स्कूल
शेरगढ़ (जोधपुर). गरीबी ने हाउदेवी को निरक्षर रखा। धार्मिक ज्ञान में अक्षर ज्ञान आड़े आया तो स्कूली बालिकाओं से सीखकर धार्मिक किताबे तो पढऩे लगी, लेकिन निरक्षर रहने का मलाल दिलो-दिमाग से नहीं गया।
किसी और गरीब बच्ची को एेसी स्थिति का सामना नहीं करना पड़े इसलिए अपने बेटों को बालिका स्कूल बनाकर गांव को भेंट करने का आदेश दिया। खुद तो नहीं देख पाएगी, मगर उनकी इच्छा के अनुरूप उनके तीनों बेटों रानीदान, देवीलाल व मदनलाल टावरी ने बालिकाओं के लिए स्कूल भवन खड़ा कर दिया है। जो 11 अक्टूबर से शेरगढ़ व आस-पास के क्षेत्र की बालिकाओं को शिक्षित करने का संसाधन बनने जा रहा है।
मदनलाल टावरी ने बताया कि करोड़ों रुपए की लागत से बनाया दो मंजिला स्कूल भवन बनकर तैयार है। इसे ११ अक्टूबर को लोकार्पण के बाद विद्या भारती संस्थान को सौंप दिया जाएगा। भवन आधुनिक सुख-सुविधाओं से परिपूर्ण है, जिसमें एक मंदिर तथा माता पिता की मूर्तियां भी लगी रहेगी। बच्चों के खेलने की सामग्री सहित सारी शैक्षणिक गतिविधियों की सामग्री भी स्कूल को भेंट की है।
गरीब बालिकाओं व अनाथ बालिकाओं का चयन करके हाउ देवी खिवराज चैरिटेबल ट्रस्ट के माध्यम से निशुल्क शिक्षा व स्कूल सामग्री की व्यवस्था की जाएगी। शेरगढ़ का इतिहास सैनिकों और वीर शहीदों के लिए जाना जाता है उसको ध्यान में रखते हुए स्कूल परिसर में 108 फीट लंबा राष्ट्रीय ध्वज 24 घंटे लहराने की व्यवस्था की है।
तीन साल पहले की थी घोषणा
हाउदेवी गरीबी के चलते अपने बच्चों को भी ज्यादा शिक्षा नहीं दिला पाई। उनके पति खींवराज टावरी एक छोटी सी दुकान संचालित करते थे। ज्यादा कमाई न होने से घर की स्थिति अच्छी नहीं थी इस कारण बच्चों की पढ़ाई के प्रति इतना ध्यान नहीं दे पा रहे थे। खींवराज के निधन से हालात और भी खराब हो गए।
हाउदेवी एक धार्मिक प्रवृत्ति की महिला होने के कारण धार्मिक कर्मकांड करने व ग्रंथों को पढऩे का बड़ा शौक था । प्रतिदिन ठाकुर जी के मंदिर में घंटों समय बिताती थी। ठाकुर जी के मंदिर के पास ही बालिका स्कूल है कुछ बालिकाओं से हाउदेवी ने धीरे-धीरे अक्षर ज्ञान सिखा और समय के साथ उन्होंने गीता, रामायण व अन्य धार्मिक किताबे पढऩे में समय बिताती। तब तक बच्चे बड़े हो गए और समय के साथ मदन टावरी का कारोबार बढ़ गया तथा अच्छी कमाई होने लगी। वे सूरत में बहुत बड़ा बिजनेस करने लगे। पूरा परिवार माँ का आदेश टालता नहीं था।
2015 में शेरगढ़ में पहली बार संत कृपाराम से श्रीभागवत कथा का आयोजन टावरी परिवार ने करवाया तब हाउ देवी ने पुत्रों के आगे इच्छा जाहिर की की शेरगढ़ कस्बे में एक ऐसा विद्यालय बना कर दो जिसमें शेरगढ़ व आस पास की बालिकाएं विद्या अर्जन कर सके और आगे बढ़ सके तभी तीनों पुत्रों ने संत कृपाराम की उपस्थिति में विद्यालय का भवन बनाने की घोषणा कर दी।
Updated on:
30 Sept 2018 12:16 am
Published on:
30 Sept 2018 12:16 am
