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चौघडिय़ा देख कर ही मादक पदार्थों की तस्करी के लिए निकलते हैं तस्कर, शगुन न होने पर रोक देते हैं अपना काम

तस्करी के लिए घर या गांव से निकलने से पहले शगुन देखे जाते हैं।

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विकास चौधरी/जोधपुर. देश में यह परम्परा है कि हर शादी-ब्याह और दूसरे हर प्रकार के मांगलिक कार्य शुभ मुहुर्त में व शगुन देखकर किए जाते हैं। मुहुर्त या शगुन न होने पर कोई भी शुभ कार्य नहीं किया जाता है। आधुनिकता के दौर में यह अंधविश्वास न सिर्फ आमजन में ही नहीं बल्कि मादक पदार्थ और शराब तस्कर भी करने लगे हैं। तस्करी के लिए घर या गांव से निकलने से पहले शगुन देखे जाते हैं। ऐसा न होने पर तस्कर रूक जाते हैं। मुहुर्त होने अथवा शगुन होने पर ही तस्करी के लिए निकल पड़ते हैं।

डोडा पोस्त व अफीम का साथ कभी नहीं

मारवाड़ में सर्वाधिक नशे का सेवन डोडा पोस्त व अफीम का होता है। अफीम की कीमतें आसमान छूने के बाद डोडा पोस्त की खपत अधिक हो रही है। अफीम के पौधे में से काला तरल पदार्थ यानि अफीम का दूध निकालने के बाद पौधे का जो अवशेष बचता है उसे डोडा पोस्त कहते हैं। यानि अफीम व डोडा पोस्त की उपज एक ही पौधे से होती है। इसके बावजूद तस्करी में इन दोनों नशीले पदार्थ को एक साथ रखना अपशुगन माना जाता है। तस्करों का मानना है कि एक ही वाहन में यदि डोडा पोस्त के साथ अफीम रख दी जाती है तो गंतव्य तक पहुंचने से पहले बीच रास्ते में अटक जाते हैं। उन्हें वाहन के धोखा देने या पुलिस के हत्थे चढऩे की आशंका रहती है।


चौघडिय़ा देखकर निकलते हैं तस्कर

अंधविश्वास का आलम यह है कि गांव या घर से निकलने से पहले चौघडिय़े मिलाए जाते हैं। उसके हिसाब से तस्कर घर से निकलते हैं। ऐसा न होने तक वे इंतजार करते हैं। पुलिस व नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो के अधिकारी भी मानते हैं कि तस्करों में अंधविश्वास अधिक होता है और वे शगुन व अपशगुन को लेकर अधिक सतर्क रहते हैं।