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निगहबान- जोजरी पर जोधपुर बोला सुप्रीम कोर्ट से …मुजरो सा

जोधपुर के लोगों में चर्चा केवल इसलिए नहीं है कि कोर्ट सख्त है। बल्कि इसलिए है कि किसी ने उनकी आवाज सुनी, वर्षों से उनको अनसुना किया जाता रहा है।
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Supreme Court on NEET protest cases.

फाइल फोटो- पत्रिका

संदीप पुरोहित
आजकल जोधपुर में राजनीति, मौसम या चुनाव की नहीं, बल्कि सुप्रीम कोर्ट की चर्चा है। वकीलों के चैंबरों से लेकर चाय की थड़ियों तक, गांवों की चौपालों से लेकर शहर की हथाइयों तक सिर्फ एक ही चर्चा सुप्रीम कोर्ट की। जोजरी नदी के प्रदूषण के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय की सख्त पहल और उसके परिणामस्वरूप सामने आए चौंकाने वाले तथ्य के बाद न्याय की धारा बह रही है…जोजरी खिलेगी। ऐसी भावना के साथ जोधपुर में आजकल प्रसन्नता का माहौल है। चर्चा के दौरान यह अभिवादन सामान्य है…सुप्रीम कोर्ट ने मुजरो सा।

जोधपुर के असाहय वाशिंदे सालों से जोजरी नदी में रासायनिक अपशिष्ट को बहता देख रहे हैं। पानी काला पड़ता हुआ देख रहे हैं, खेतों की उर्वरता घट गई और पशुधन को भारी नुकसान। यही नहीं, दर्जनों गांवों का जीवन संकट में फंसा हुआ है। ऐसे में जब सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश संदीप मेहता और विक्रमनाथ के आदेश से गठित हाई पावर कमेटी ने, जिसकी अगुवाई सेवानिवृत्त न्यायाधीश संगीत लोढ़ा कर रहे हैं, औचक निरीक्षण किया जिसने पूरे तंत्र पर सवाल खड़े कर दिए। प्रदूषित पानी आखिर वर्षों तक अधिकारियों की नजर से बचकर कैसे बहता रहा। इस कार्रवाई पूरे प्रशासनिक ढांचे पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है।

जोधपुर के लोगों में चर्चा केवल इसलिए नहीं है कि कोर्ट सख्त है। बल्कि इसलिए है कि किसी ने उनकी आवाज सुनी, वर्षों से उनको अनसुना किया जाता रहा है। पचास से अधिक गांवों और लाखों लोगों को प्रभावित करने वाले इस संकट को पहली बार इतनी गंभीरता से लिया जा रहा है तो सिर्फ सुप्रीम कोर्ट के कारण। जब अदालत को सीबीआइ जांच की संभावना तक व्यक्त करनी पड़े तो यह केवल पर्यावरणीय नहीं, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही का भी मामला बन जाता है। प्रशासन की नाक के नीचे सबकुछ होता रहा, पर अर्कमण्य और भ्रष्ट अफसरों को दम तोड़ती जोजरी नजर नहीं आई। यही कारण है कि आज शहर में न्यायपालिका की भूमिका की खुलकर सराहना हो रही है। लोग न्यायाधीश संदीप मेहता और उनके फैसलों की खुलकर तारीफ कर रहे हैं। मानवाधिकार, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक न्याय के मुद्दों पर उनकी सक्रियता पहले भी दिखाई देती रही है।

जोजरी का मामला जीवन मरण का सवाल है, क्योंकि यह सीधे लोगों के जीवन, स्वास्थ्य और भविष्य से जुड़ा है। यह मामला केवल प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों का नहीं, बल्कि उस सामूहिक उदासीनता का भी है जिसने नदियों को बीमार होने दिया। अब जबकि सच सामने आ चुका है, केवल निलंबन, नोटिस या एफआइआर से काम नहीं चलेगा। प्रदूषण फैलाने वालों और सहायक अफसरों के खिलाफ कठोर कार्रवाई, नदी तंत्र के पुनर्जीवन की समयबद्ध योजना और जवाबदेही तय करने वाली स्थायी व्यवस्था की जरूरत है।

हम आज सुप्रीम कोर्ट के गुणगान कर रहे हैं । न्याय की चर्चा कर रहे हैं यह अच्छी बात है। लेकिन उससे भी बड़ी बात यह है कि यह केवल चर्चा तक सीमित नहीं रहे, स्थायी बदलाव में बदले। इसकी निगहबानी का जिम्मा हाइ पावर कमेटी तक नहीं छोड़े बल्कि खुद भी आगे आएं। जोजरी ही नहीं, सभी जलाश्यों को प्रदूषित होने से बचाएं, क्योकि नदियां केवल जलधाराएं नहीं होतीं, वे उस क्षेत्र की जीवनरेखा होती हैं। और जब एक नदी को न्याय मिलता है, तो दरअसल पूरे समाज को न्याय मिलता है। sandeep.purohit@in.patrika.com