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Noise: गर्भ में पल रहे शिशुओं को ध्वनि प्रदूषण से बचाने की चुनौती

Noise Pollution - जयपुर, जोधपुर और कोटा में 650 स्थानों पर ध्वनि प्रदूषण की मॉनिटरिंग -आने वाले सालों में बहरापन के आनुवंशिक बीमारी बनने की आशंका, पैदा होने वाले बच्चे देरी से बोलना सीखेंगे
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Noise: गर्भ में पल रहे शिशुओं को ध्वनि प्रदूषण से बचाने की चुनौती

Noise: गर्भ में पल रहे शिशुओं को ध्वनि प्रदूषण से बचाने की चुनौती

जोधपुर. सडक़ों पर लगातार बढ़ रहे ट्रेफिक, मोबाइल व फैक्ट्रियों के शोर से ध्वनि प्रदूषण उच्च स्तर पर पहुंच रहा है। पचास फीसदी लोगों को बहरेपन की शिकायत है। आने वाले सालों में बहरापन आनुवंशिक बीमारी बनने की आशंका है जिससे पैदा होने वाले बच्चे बहरे होंगे। जब वे सुन नहीं सकेंगे तो बोलना भी देरी से सीखेेंगे। इस चुनौती से निपटने के लिए केंद्रीय सडक़ अनुसंधान संस्थान देशभर में ध्वनि एवं ट्रेफिक सर्वे कर रहा है ताकि वैज्ञानिक रिपोर्ट के आधार पर इस चुनौती से निपटा जा सके। राजस्थान में इसके लिए जयपुर, जोधपुर और कोटा शहरों का चयन किया गया है। जयपुर में 300 और जोधपुर में 200 स्थानों पर ध्वनि प्रदूषण का मापन किया जाएगा। कोटा में 150 से अधिक स्थानों पर ध्वनि व ट्रेफिक की मॉनिटरिंग होगी।

जोधपुर में लाचू कॉलेज के विद्यार्थी शामिल
संस्थान के प्रोजेक्ट में एन्वायोटेक नई दिल्ली और लाचू कॉलेज जोधपुर के एमएससी जूलॉजी द्वितीय सेमेस्टर के विद्यार्थी तनुजा, कंचन, दिवांशी, अदिति, प्रज्ञा, योगिता, जुनैद और साहिल शामिल है। जोधपुर में दस दिनों तक ध्वनि का स्तर मापा जाएगा। कार्य शुरू हो गया है।

70 डेसिबल से अधिक ध्वनि खतरनाक
- 50 डेसिबल ध्वनि ठीक, लेकिन शहरों में बढ़ रहा ध्वनि का स्तर
- 70 डेसिबल से अधिक ध्वनि मानव की सुनने की क्षमता पर डालती है असर
- 27 प्रतिशत ध्वनि प्रदूषण में मोबाइल का योगदान
- 70 प्रतिशत प्रदूषण सड़क पर चल रहे वाहनों से, हॉनर् बजाने से और अधिक इजाफा

कान में 16 हजार छोटे-छोटे रोम
हमारे कान में करीब 16000 छोटे रोम होते है जो संवेदक का कार्य करते है। स्थिति यही रही तो अगले 50 वर्षो में बहरापन आनुवंशिक बीमारी में बदल जाएगा। बहरे बच्चे पैदा होंगे जो ठीक से बोल भी नहीं पाएंगे।
- डॉ पुनीत सारस्वत, प्राणी शास्त्र व पर्यावरण विभाग, लाचू कॉलेज जोधपुर