
गांवों के पेड़-पौधे चैत्र-बैशाख में बनते हैं ‘दुल्हन’
भोपालगढ़ (जोधपुर) . ग्रामीण इलाकों में इन दिनों पेड़-पौधों पर रंग-बिरंगी चुंदडिय़ां अटकी नजर आती हैं। हवा चलने के दौरान चुनरियां ओढ़े ये पेड़-पौधे भी नाचते हुए से नजर आते हैं।
असल में इन दिनों आखातीज पर्व से पहले ही ग्राम्यांचल में सावों की धूम शुरु हो गई है। ऐसे में क्षेत्र के ग्रामीण अंचल में जिस गांव-ढाणी की तरफ भी जाओ उधर डीजे व गीतों की धुनें सुनाई देती हैं। गांवों में शादी होने पर बहन-बेटी के मायरा भरने की परम्परा है।
इस परम्परा में किसी महिला के बेटे-बेटी की शादी के समय उसके भाई अपने सभी नाती-रिश्तेदारों के साथ पूरे लवाजमे व ढोल-नगाड़े बजाते हुए अपनी बहन के यहां जाते हैं और वहां बहन को नकदी, सोने-चांदी के गहने व कपड़े आदि देकर मायरा भरने की रस्म निभाते हैं। इसके बाद पूरा लवाजमा वापिस जाते समय बहन के गांव की कांकड़ यानि उसके गांव की सीमा पर एक अनूठी रस्म निभाई जाती है। इसमें भाई अपनी बहन के गांव के रूंखड़े यानि पेड़-पौधों पर चुंदड़ी ओढाता है।
इसी रस्म के चलते इन दिनों गांवों की सीमा पर पेड़-पौधे इन चुंदडिय़ों से रंगीन नजर आ रहे हैं। वहीं इन दिनों आंधियो के चलते ऐसा प्रतीत हो रहा है, मानो चुंदडिय़ों में लिपटे ये पेड़-पौधे नाच रहे हैं। इस परम्परा को हिन्दू हो या मुस्लिम हर कोई निभाता है।
पेड़-पौधों पर चुंदड़ी ओढाने के पीछे ऐसी मान्यता है कि मायरे भरने के दौरान उनकी कोई बहिन-बेटी बिना चुंदड़ी नहीं रही और उन सबको चुनरी ओढ़ाई गई है। पेड़-पौधों पर चुंदड़ी को देखकर गांव के लोग ये भी पता लगा लेते हैं कि मायरा हल्का या भारी कैसा भरा गया है।
एक मान्यता यह भी है कि पेड़-पौधों पर चुनरी ओढ़ाने से यह मतलब निकाला जाता है, कि किसी भाई ने इस गांव में अपनी बहन के मायरा भरा है, तब उसने गांव के पेड़-पौधों को भी पीछे नहीं रखा।
अनजान तो डर जाते हैं
कई लोग जो इस परम्परा से अनभिज्ञ हैं, वे रात में पेड़ों पर उड़ती चुंदड़ी देखकर डर जाते हैं और आगे जाने की बजाय वापस लौट जाते हैं।
Updated on:
20 Apr 2019 11:09 am
Published on:
20 Apr 2019 11:09 am
