
insurance claim issue in State consumer protection commission
राज्य उपभोक्ता संरक्षण आयोग ने अपने महत्वपूर्ण फैसले में यह निर्णय किया है कि हृदय रोग गम्भीर बीमारी है, न कि उसका इलाज। आयोग के न्यायिक सदस्य कमलकुमार बागड़ी व सदस्य मीना मेहता ने इसी के साथ अपील मंजूर करते हुए नेशनल इंश्योरेंस कंपनी को आदेश दिया कि अपीलार्थी को 2 लाख 80 हजार 506 रुपए मय 9 फीसदी ब्याज, 20 हजार रुपए हर्जाना और 10 हजार रुपए वाद व्यय अदा करे।
अपीलार्थी रीना शारडा ने अधिवक्ता अनिल भण्डारी के माध्यम से अपील दायर कर कहा कि उनके वयोवृद्ध ससुर को हृदय रोग होने पर उनकी आयु देखते हुए डॉक्टरों ने बाइपास के बजाय एंजियोप्लास्टी कर स्टंट लगाए। फिर बीमा कम्पनी के यहां 3 लाख 26 हजार 14 रुपए का दावा पेश किया गया, लेकिन बीमा कंपनी ने महज 45 हजार 508 रुपए का दावा मंजूर किया। साथ ही बकाया दावा यह कहते हुए नकार दिया कि मरीज यदि बाइपास कराते तो हृदय रोग की बीमारी को वे क्रिटिकल मानते।
इस पर जिला उपभोक्ता मंच में परिवाद दायर किया तो वहां भी 8 जुलाई 2016 को परिवाद खारिज कर दिया गया। इस पर राज्य उपभोक्ता संरक्षण आयोग में अपील दायर कारते हुए अधिवक्ता भण्डारी ने कहा कि चिकित्सा विज्ञान में कोई बीमारी गम्भीर या साधारण हो सकती है, न कि उसका इलाज। उन्होंने कहा कि बीमारी का इलाज डॉक्टरों के हाथ में होता है। उन्होंने कहा कि मरीज की आयु देखते हुए चिकित्सकों ने सही निर्णय लिया, इसलिए अपील मंजूर की जाए। वहीं बीमा कम्पनी की ओर से कहा गया कि जिला मंच ने परिवाद सही खारिज किया है।
राज्य आयोग ने दोनों पक्षों की बहस सुनने के बाद अपील मंजूर करते हुए कहा कि हृदय रोग अपने आप में क्रिटिकल बीमारी है और स्टंट डालने का कार्य हृदय रोग की बीमारी होने पर ही होता है और बाइपास टालने के लिए स्टंट लगाया जाता है। उन्होंने बीमा कम्पनी पर 20 हजार रुपए हर्जाना लगाते हुए अपील मंजूर कर अपीलार्थी को 2 महीने में 2 लाख 80 हजार 506 रुपए मय 9 फीसदी ब्याज व 10 हजार रुपए वाद व्यय अदा करने का आदेश दिया।
Published on:
25 Dec 2017 05:47 pm
बड़ी खबरें
View Allजोधपुर
राजस्थान न्यूज़
ट्रेंडिंग
