
JNVU retired teacher gave reference of Lahore court for pension
जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय से एक महीने पहले सेवानिवृत्त हुए मनोविज्ञान विभाग के प्रोफेसर डॉ. रवि गुंठे ने राज्यपाल को पत्र लिखकर अपनी पेंशन और रुके हुए वेतन को दिलाने की मांग की है। पत्र में उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय के किसी निर्णय का हवाला दिया लेकिन पत्र के साथ उन्होंने पाकिस्तान के लाहौर हाईकोर्ट के कर्मचारियों के संबंध में दिए गए किसी निर्णय की प्रति संलग्न की है। लाहौर हाईकोर्ट की प्रति लगा यह पत्र विवि के कला संकाय डीन प्रो. धर्मचंद जैन और मनोविज्ञान विभागाध्यक्ष प्रो. एलएन बुनकर को भी मिला। दोनों ने विवि को शिकायत की है। इधर विवि के कुलपति प्रो. आरपी सिंह ने कहा कि प्रो. गुंठे के ड्यूज की जांच के लिए कमेटी बैठा दी गई है।
यह है मामला
प्रो. गुंठे को विवि ने जुलाई में निलंबित कर दिया था। उस समय वे विभाग के अध्यक्ष थे। 30 सितम्बर को सेवानिवृत्त से पहले कुछ दिन पहले ही उन्हें बहाल किया गया। सेवानिवृत्त होने के बाद विवि ने उनका बकाया वेतन और पेंशन रोक ली। कला संकाय डीन और वर्तमान एचओडी प्रो. बुनकर ने उन पर विवि का बकाया होने की वजह से नो ड्यूज नहीं दिया। प्रो. गुंठे इसको लेकर कभी धरना तो कभी ज्ञापन के मार्फत अपना विरोध जता रहे हैं। उन्होंने 13 अक्टूबर को राज्यपाल व कुलाधिपति कल्याण सिंह को पत्र लिखकर अपना बकाया दिलाने की मांग की। पत्र में उन्होंने लिखा कि सेवानिवृत्ति के बाद पेंशन शुरू नहीं करना सर्वोच्च न्यायालय के आदेश की अवहेलना है। पत्र के साथ संलग्न के तौर पर उन्होंने लाहौर हाईकोर्ट का कर्मचारियों के संबंध में दिया गया निर्णय लगा दिया।
मैंने नहीं लगाया
मैंने राज्यपाल को पत्र लिखा है और उसकी प्रति डीन और एचओडी को दी है। डीन और एचओडी दोनों के पास लाहौर हाईकोर्ट के निर्णय की प्रति है लेकिन यह मैंने नहीं लगाई। अगर राज्यपाल को मिली है तो वे कार्यवाही करें। -प्रो. रवि गुंठे, सेवानिवृत्त शिक्षक, जेएनवीयू
जांच समिति गठित की
वे मनोविज्ञान के प्रोफेसर है। वे जानें उन्होंने लाहौर हाईकोर्ट का निर्णय क्यों लगाया। खैर, हमनें उन पर विवि के बकाया की जांच के लिए एक कमेटी गठित कर दी है। -प्रो. आरपी सिंह, कुलपति, जेएनवीयू
कोई फर्क नहीं पड़ता
किसी दूसरे देश के निर्णय की कॉपी लगाने से कोई फर्क नहीं पड़ता। हम तो कोर्ट में अक्सर दूसरे देशों के निर्णयों का हवाला देते रहते हैं। -ऐश्वर्या भाटी, अधिवक्ता, सुप्रीम कोर्ट, दिल्ली
Published on:
01 Nov 2017 11:37 am
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