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हौसले मजबूत होने से नहीं बदले इरादे, इसलिए मिल गई आजादी

मुंबई से महात्मा गांधी ने करो या मरो का फरमान सुनाया था। इसमें शामिल होने पर ब्रिटिश हुकूमत ने 1943 में मुझे दो साल के लिए जेल भी भेज दिया

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हौसले मजबूत होने से नहीं बदले इरादे, इसलिए मिल गई आजादी

कन्नौज. हौसले मजबूत होने से इरादे नहीं बदले, इसलिए मिल गई आजादी। यह कहना है 104 वर्षीय स्वतंत्रता संग्राम सेनानी गोवर्धन लाल कनौजिया का। तिर्वा कस्बे के निवासी इस आजादी के दीवाने की मानें तो नौ अगस्त का दिन जिंदगी में कभी नहीं भुलाया जा सकता है। यह वही दिन था जब तिर्वा में आजादी के दीवाने सिर पर कफन बांधकर निकल पड़े थे। मुंबई से राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने करो या मरो का फरमान सुनाया था। इसमें शामिल होने पर ब्रिटिश हुकूमत ने 1943 में मुझे दो साल के लिए जेल भी भेज दिया।

दमन की हुई कोशिश

9 अगस्त 1942 की रात को जब राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने मुंबई से करो या मरो का नारा दिया, तो फरमान तिर्वा तक पहुंचा। यहां रात में जनसभा करने की रणनीति बनाई गई। इसकी भनक ब्रिटिश हुकूमत को लग गई। इससे प्रशासन ने चौकसी बढ़ा दी। जनसभा नहीं होने दी गई। रणनीति बनाने में अंग्रेजों ने लोगों को चिह्नित कर घरों पर दबिश देकर दमन की कोशिश की। कोई भी गिरफ्तारी नहीं हो सकी। एक वर्ष तक साथियों के साथ रंपरा, औसेर व उमर्दा के जंगलों में रहकर समय गुजारा।

दो साल के लिए भेजा जेल

25 जुलाई 1943 को गांधी चौक से ब्रिटिश शासकों ने पकड़ लिया। मुकदमा दर्ज कर दो साल के लिए जेल भेज दिया गया। जमानत होने के बाद भी पीछा नहीं छोड़ा। लगातार परिवार के साथ मारपीट करते रहे। बार-बार गिरफ्तार करने के लिए घर पर दबिश देते रहे। लेकिन मेरे हौसले मजबूत होने से इरादे नहीं बदले। हमारा संघर्ष बराबर चलात रहा। आजादी मिलने के कुछ वर्ष बाद भी अंग्रेजों का खौफ जेहन में बरकरार रहा। धीरे-धीरे लोकतंत्र की ताकत बढ़ने से राहत मिल सकी।

हालातों से लोगों की सोच में आया बड़ा बदलाव

स्वतंत्रता संग्राम सेनानी गोवर्धन लाल कनौजिया अब वह 104 वर्ष की उम्र पूरी कर चुके हैं। उनकी मानें तो हालातों में बहुत बड़ा बदलाव हो गया है। लोगों के हौसले मजबूत नहीं हैं। आज लोग अधिक धन की चाहत में अपना ईमान भी बेचने में कसर नहीं छोड़ते हैं। आजादी से पूर्व लोगों को धन की चाहत नहीं थी। उनमें ईमानदारी कूट-कूट कर भरी थी। इसीलिए इतना बड़ा मकसद हल हो सका।