
बाबाघाट पर आकर गंगा में लगाते थे डुबकी, शिव की वंदना के साथ खो जाते अटल जी
कानपुर। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी अब इस दुनिया में नहीं रहे, लेकिन उनके किस्से कानपुर के चाय कि दुकान, चौराहों, और शिवालयों में सुनी जा सकती हैं। क्योंकि अटल जी का इस शहर से गहरा रिश्ता रहा है। वो ग्वालियर से यहां आकर डीएवी कॉलेज से राजनीति शस्त्र मे प्रथमश्रृणी में पास हुए और फिर पिता के साथ एजएलबी में दाखिला। इसी के चलते अटल जी कई साल मैनचेस्टर ऑफ ईस्ट में रहे। पढ़ाई के दौरान अटल जी अपनी मित्र मंडली के साथ सावन के महिने में कॉलेज से डेढ़ किमी की दूरी पर स्थित बाबा घाट जाया करते और गंगा में डुबकी लगा पूजा-अर्चना के बाद मित्रों को भक्तिरस की कविताएं सुना मंत्रमुग्ध करते थे। अटल जी को तैरना नहीं आता था इसी के चलते वह गंगा के नीचे उतरकर सिर्फ गिनती की 11 डुबकी लगाकर पानी से बाहर निककर दोस्तों की तैराकी का लुफ्त उठाया करते थे। डीएवी कॉलेज के पूर्व प्रोफेसर स्व मदन मोहन पांडेय के पुत्र केके पांडेय बताते हैं कि अटल जी ईश्वर को मानते थे और बिना स्नान ध्यान के अन्न को हाथ नहीं लगाते। सावन के माह में वो हरदिन शिवालयों में जाते और पूजा-पाठ करते।
बाबाघाट पर आकर करते थे पूजा
गंगा किनारे बने बाबा घाट को शायद ही कोई जानता होगा, लेकिन एक समय था जब देश के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी अपने दोस्तों के साथ इस घाट पर सावन माह के अवसर पर कई घंटे तक समय गुजारा करते थे। वो यहां दोस्तों के साथ मस्ती करते, गीत गाते और घंटो ठंडाई पीसते थे। बटेश्वर में 1924 में जन्मे अटल बिहारी वाजपेयी के पिता कृष्ण बिहारी वाजपेयी और माता कृष्णा देवी थी। उन्होंने कानपुर के डीएवी कॉलेज से पॉलिटिकल साइंस में एमए किया था। अपने पिता के साथ इसी कॉलेज से एलएलबी की पढ़ाई की थी। अटल जी का लगाव कानपुर के एतिहासिक शिव मंदिरों से था। इसी के चलते वो कॉलेज परिसर की कम दूरी पर बने बाबा घाट आते और भगवान शिव की पूजा करते थे।
पसंदीदा घाट हुआ करता था
डीएवी कॉलेज होस्टल के पीछे करीब आधा किलोमीटर की दूरी पर गंगा किनारे बने बाबा घाट, अटल का सबसे पसंददीदा घाट हुआ करता था। इस घाट के पास रहने वाले शिवरतन मल्लाह (86) ने बताया, अटल सावन के माह के पहले सोमवार को भोर पहर अपने दोस्तों के साथ आ धमके। वह कपड़े उतारकर गंगा में डुबकी लगाई और फिर गंगा जल लेकर मंदिर में विराजे भगवान शिव की पूजा अर्चना के बाद पूरे 51 बेलपत्र चढ़ाए थे। इसके बाद घाट के किनारे बैठ गए और भक्तिगीत गुन-गुनाने लगे। दोस्तों ने अटल जी से कहा पंडित जी क्यों भक्तिरस से ओतप्रोत कविता सुनाएं। अटल जी पहले कुछ देर देखते रहे और फिर उन्होंने एक नहीं कई कविताएं सुनाई। शिवरतन कहते हैं कि अटल जी कविताएं सुनाते समय कहीं खो जाया करते और मित्रों के टोंकने के बाद कॉलेज की तरफ कदम बढ़ाते।
ठंडाई के उठाया था लुफ्त
शिवरतन बताते हैं कि उनदिनों मेरी उम्र करीब 14-15 साल की होगी। इसलिए इन्हें बहुत कुछ तो याद नहीं है, लेकिन अटल जी अपने सभी दोस्तों में सबसे चंचल स्वभाव के हुआ करते थे। नये साल पर कॉलेज में छुट्टी होने के चलते अपने दोस्तों के साथ जब अटल जी आए तो सबने ठंडाई बनाने का फैसला किया। अपने दोस्त के घर से सिलबट्टा मांगा और 3 किलो दूध पैसा एक आना देकर लिया। उन सबके आते ही हम भी उनके पास पहुंच गए। उन्होंने हमसे चीनी मांगी और कहा कि इसके बदले दो गिलास ठंडाई देंगे। इस बुजुर्ग के अनुसार, उस दिन अटल जी ने पहली बार इस घाट पर ठंडाई पीसी थी। वो पूरा मूड में थे, खूब गीत गा रहे थे।
आज भी शिवलिंग है मैजूद
जिस घाट पर कभी अटल जी कई घंटे अपने मित्रों के साथ बैठकर समय बिताया था, आज वो बदहाल है। हांलाकि वर्तमान में इस घाट पर काफी बदलाव आ चुका है। यहां पर एक मोहल्ला बस चुका है, लेकिन उस समय का शिवलिंग आज भी यहां मौजूद है। शिवरतन बताते हैं कि जब अटल पीएम बने तब इनके दोस्तों को उनके साथ मस्ती करने वाला आज कामयाब हो चुका है। इस बात की खुशी हुई। कहा कि ये हम सबके लिए गौरव की बात है कि वो ना केवल देश के पीएम रहे हैं, बल्कि उन्हें भारत रत्न से भी सम्मानित किया जा चुका है। पर उनके गुजर जाने की खबर से हमें बहुत निराशा हुई। हमने दो दिन तक भोजन नहीं ग्रहण किया। उम्र के आखरी पड़ाव पर खड़े बुजुर्ग के पास अटल जी के निधन के बाद कोई शब्द नहीं थे। बस उन्होंने इतना कहा कि वो परमात्मा के अवतार थे और देश को बहुत कुछ देकर चले गए।
भगवतघाट जाकर देखी कर्नल की मूर्ति
शहर के इतिहासिक भगवतघाट स्थित बने भगवान शंकर के मंदिर के बाहर दिवार पर अंग्रेज कर्नल की मूर्ति स्थापित है। मंदिर आने वाले भक्त भगवान शंकर के साथ ही क्रूर अंग्रेज अफसर की पूजा और परिक्रमा करते हैं। मंदिर के पुजारी ने बताया कि क्रूर कर्नल ने 160 साल पहले जबरन प्राचीन मंदिर पर अपनी मूर्ति स्थापित करवाई थी। अंग्रेज की यह प्रतिमा इस मंदिर के दरवाजे पर भगवान गणेश और मां दुर्गा की मूर्ति के बीच स्थापित है। काले घोड़े पर सवार हाथों में हंटर और रोबीली मूंछों वाले इस अंग्रेज अफसर के बारे में शहरवासियों का कहना है कि यह कर्नल स्टुअर्ट की मूर्ति है, जिसे उसने 1857 में मंदिर की स्थापना के समय लगवाया था। केके पांडेय बताते हैं कि जब अटल जी को इस ंमदिर के बारे में जानकारी हुई तो वो यहां आए और भगवान शिव के दर्शन करने के बाद कहा कि था कि इसे यहां से मत हटाना। यह मूर्ति आने वाले भविष्य को अंग्रेजों की क्रूरता की कहानी को याद दिलाती रहेगी।
Published on:
20 Aug 2018 08:02 am
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