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अटल जी ने गुरू की सुनी आवाज, मीटिंग छोड़ नंगे पैर लगा दी दौड़

स्कूल के चलते मिलने के लिए गए थे दिल्ली, सुरक्षाकर्मियों ने मिलवाने से किया इंकार, तब कहख् जाओ अटल से कहो कि दरवाजे के बाहर खड़े हैं मालवीय

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अटल जी ने गुरू की सुनी आवाज, मीटिंग छोड़ नंगे पैर लगा दी दौड़

कानपुर। देश के पूर्व प्रधानमंत्री और बीजेपी के पितामह अब इस दुनिया में नहीं रहे। गुरूवार की देरशाम उनका दिल्ली के एम्स अस्पताल में 93 साल के उम्र में निधन हो गया। जिसके कारण पूरे देश में शोक की लहर है और उनके चाहने वालों के घर में भोजन नहीं पका। ऐसा ही एक परिवार कानपुर में भी रहता है, जिनके दिलों में अटल जी बसते हैं। स्व मालवीय जी के पुत्र डॉक्टर कौशल किशोर ने बताया कि हमारे पिता जी ने एक पब्लिक स्कूल बनाया था लेकिन सीबीएससी से मान्यता नहीं मिली। जब काफी मेहनत के बाद भी स्कूल की मान्यता नहीं मिली तब हम और बाबू जी अटल जी से मिलने दिल्ली गए। वहां पर उनके ऑफिस वालों ने मुलाकात करवाने से मना कर दिया तब बाबू जी ने कहा की उनसे जाकर कहो की कानपुर डीएवी कालेज से उनके गुरु मदन मोहन पांडेय आएं हैं। जैसे ही इसकी खबर अटल जी को मिली तो वो मीटिंग छोड़ दौड़ लगा दी और बाबू जी के पैर छूकर अंदर ले गए।

आठ माह तक गुरू के घर में रहे
पूर्व प्रधानमंत्री जब ग्वालयिर से शिक्षा-दिक्षा के लिए शहर आए तो उन्होंने डीएवी कॉलेज में एडमीशन लिया। यहीं पर वो कॉलेज के हॉस्टल में रहने लगे। अटल जी क्लास में आगें की पंक्ति में बैठते थे। उसी दौरान प्रोफेसर मदन मोहन पांडेय ने उनसे एक प्रश्न किया। अटल जी सटीक जवाब देकर प्रोफेसर का दिल जीत लिया। क्लास से जाते वक्त पांडेय जी ने अटल जी से कहा कि छृट्टी के बाद तुम मिलकर जाना। वो कॉपी, किताबें लेकर प्रोफेसर के रूम में गए। जहां पांडेय जी ने उन्हें अपने घर की चाफी थमा कहा, अब आप हॉस्टल में नहीं हमारे घर में रहोगे। करीब आठ माह तक अटल जी प्रोफेसर के घर में रहे। अटल बिहारी के गुरु दिवंगत मदन मोहन की पुत्रवधु डॉ शक्ति पांडेय ने बताया कि वो छात्रों को क्लास में कई-कई घंटे पढ़ाया करते थे। इसी के चलते छात्र क्लास से चुपचाप निकल जाते। पर अटल जी टस के मस नहीं होते थे। इसी के कारण अटल जी की गिनती अच्छे मेधा में होने लगी। हमारे ससुर उन्हें अकेले में पढ़ाते। फिर अपने रूम में ले जाते और दोनों साथ में बैठ कर भोजन किया करते।

राजनाथ सिंह को लगाया फोन
डॉक्टर कौशल किशोर ने बताया कि अटल जी ने बाबू जी से हालचाल पूछा। जब बाबू जी ने आने के बारे में बताया तो उन्होंने राजनाथ सिंह को फोन करके बताया की यह हमारे गुरु है इनका काम होना चाहिए। उसके बाद अटल जी मेरे बाबू जी से बात करते हुए कहा की हम तो यंहा ऐसे फंसे हुए हैं राजनीति में जो चल रहा है उससे परेशान रहता हूं। लेकिन जो आपसे सीखा है उसी पर चल रहा हूं। जो राजनीति का पाठ आने में पढ़ाया है, उसे कोई तोड़ नहीं सकता। डॉक्टर कौशल किशोर बताते हैं कि अटल जी ने खुद कार से हम दोनों को रेलवे स्टेशन छोड़ने गए और वहां से राजनाथ सिंह को फिर से फोन कर कहा कि गुरू जी के पास अधिकारियों को भेजें। सरकारी सिस्टम के इन्हें चक्कर नहीं लगाना पड़े। घर पहुंचते ही वहां सरकारी अधिकारी मोजूद थे और अटल जी के चलते बाबू जी का सपना साकार हो पाया।

साइकिल से जाते थे कॉलेज
अटल जी प्रोफेसर पांडेय के मकान में पूरे आठ माह तक रहे। डीएवी कालेज में पढ़ाई के दौरान अटल जी अपनी पुरानी साइकल से आते थे और इसी मकान के चबूतरे पर बैठकर पढ़ाई करते थे। स्व मदन मोहन की पुत्रवधु डॉक्टर शक्ति पांडेय ने बताया कि हमारे ससुर अटल जी के गुरु थे। उन्होंने अटल जी को अपने बेटे की तरह माना था। अटल जी भी उनको अपने पिता की तरह मानते थे। बापू जी ने उनको एक अच्छा नागरिक बनाने के लिए उनको अच्छी शिक्षा देते थे। डॉक्टर शक्ति कहती हैं कि अटल जी टूटी साइकिल से जाते और जब घर वापस आते तो हमारी सासू मां जान जाती कि उनक पति का होनहार छात्र आ गया है। घर में आते ही सासू मां को वो कविताएं सुनाते तो वहीं रामचरित मानस की श्लोक के जरिए उन्हें मंत्रमुग्ध कर देते।

जमीन पर बैठकर खाते कढ़ी और चावल
डॉक्टर शक्ति पांडेय ने बताया कि हमारी सासू मां उनकी पसंद के व्यंजन बनाती। पर सबसे ज्यादा उन्हें कढ़ी और चावल पसंद थे। बताती, अटल जी कहा करते थे अम्मा आपके हाथों की बनी कढ़ी और फात का स्वाद लाजवाब है। अम्मा जी आप जब हम कॉलेज से घर आएंगे तो साथ में दही लाएंगे। अटल जी दही लेकर आते तो सासू मां पकड़े और, दही बड़ा बनाती। ससुर और अटल जी बैठकर भोजन करते। डॉक्टर शक्ति का कहना है की अटल जी ने पब्लिक एडमिस्ट्रेशन का पार्ट बाबू जी से सीखा था की कैसे प्लानिंग करना है कैसे संगठन के लिए काम करना है। बापू जी से ज्ञान प्राप्त करके वो ऐसे खड़े हुए जैसे चाणक्य खड़ा हुआ था। अटल जी ने अपनी कविता “मै हार नहीं मानूँगा मै रार नहीं ठानूँगा“ की तर्ज पर उसको चरीथार्त करके दिखाया। कई बार चुनाव हारने के बाद अंत में उनकी जीत हुई थी। इसलिए भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी हैं।