
हाथी से बैर कर साइकिल का थामा हैंडिल, मायावती ने मुहंबोले भाई का करवा दिया एनकाउंटर
कानपुर. एक दशक पहले चुनावी आहट सुनजे ही पाठा और बीहड़ के जंगलों से डकैतों के बूटों की गूंज सुनाई देने लगती थी। डकैत बंदूक के बल पर अपने पसंदीदा उम्मीदवार को मत देने का फरमान सुना देते और जो नहीं मानता उसे इस दुनिया से उठा देते। पाठा के बेताब बादशाह रहे ददुआ की 52 गांवों सल्तनत चलती थी। इतना ही नहीं पूरे 30 साल तक यूपी, एमपी और राजस्थान में इसके नाम का डंका बजता रहा, पर कभी कभी पुलिस के हत्थे नहीं लगा, इसकी बजय राजनीतिक संरक्षण माना जाता रहा है। चुनाव के वक्त ददुआ का लेटर पैड जारी होता और जिसके नाम की मुहर डकैत लगा देता वही जनपतिनिधि बन जाता। ददुआ कभी बसपा सुप्रीमो का खास रहा और इसके चुने गए बंदों को मायावती टिकट बेहिचक दे दिया करती थीं। पर 2003 में मुलायम सिंह के सीएम बनते ही ददुआ ने हाथी को छोड़ साइकिल का हैंडिल थाम लिया और 2004 लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के उम्मीदवारों के जिताने का फरमान जारी कर दिया। यहीं से ददुआ के खात्में की उल्टी गिनती शुरू हो गई। मायावती जैसे ही 2007 में सत्ता में आई, वैसे ही डकैत को काम तमाम करवा दिया।
राजनीति में इस नेता ने कराई थी इंट्री
ददुआ का रूतबा बांदा, चित्रकूट, मानिकपुर, ललितपुर के साथ ही एमपी के सतना, भिंड, मुरैना तक में कायम था। ददुआ 80 के दशक में पाठा के जंगल में उतरा और फिर कभी पुलिस के हत्थे नहीं लगा। पाठा के आपपास के सैकड़ों आदिवासी बाहूल्य गांवों में ददुआ ने पैठ बनाई और उसे लोग पूजने लगे। इसी का फाएदा ददुआ ने उठाया और पूर्व सांसद रामसजीवन के कहने पर जंगल में ही बैठकर बसपा की सदस्यता ले ली। रामसजीवन सिंह बांदा के कद्दावर नेता थे। वह तीन बीर सांसद और इतने ही बार विधायक रहे थे। 2004 के लोकसभा चुनाव के दौरान सपा कंडीडेट श्यामाचरण गुप्ता ने ददुआ से संपर्क किया और उसे सपा में शामिल करवा लिया। रामसजीवन को जब ददुआ के पाला बदलने की जानकारी मिली तो उन्होंने डकैत गया पटेल को जंगल भेजा। ददुआ ने गया को बैरंग वापस भेज दिया। लोकसभा चुनाव में ददुआ के फरमान से श्यामाचरण चुनाव जीत गए।
इनको चुनाव में हरवाया
ददुआ 2004 के बाद खुलकर राजनीति में कूद गया था। उसके बसपा के साथियों ने 2007 के चुनाव में अपने को अलग रहने की समझाइश दी थी, लेकिन वह नहीं माना और अपने पुराने साथी आरके पटेल दद्दू प्रसाद, शिवसेवक, पुरुषोत्तम द्विवेदी को हराने के लिए जंगल से फरमान भेजा। इसकी भनक मायावती को हुई तो उन्होंने भी ददुआ को समझाया पर वह नहीं माना द्य 2007 के चुनाव में बुंदेलखंड से सिर्फ दद्दू प्रसाद ही जीत पाए, बांकि चुनाव हार गए। बसपा के नेता चुनाव हारने के बाद ददुआ के गुरु गया के जरिए ददुआ के पास पैगाम भिजवाया । जिसमें इन नेताओं ने लिखा कि ददुआ बहन जी सीएम बन गई है और तेरी मौत के लिए एसटीएफ पाठा भेज दी गई है। बताया जा रहा है कि गया ने बसपा नेताओं और ददुआ के बीच बैठक करवाई लेकिन बात नहीं बनी और ददुआ दा इंड की पटकथा की इबारत लिखनी शुरु हो गई।
तीन दशक तक किया राज
ददुआ का जन्म चित्रकूट जिले के देवकली गांव में 1949 में हुआ था। ददुआ पर पहला केस 1975 में (थाना रैपुरा) में मर्डर का दर्ज हुआ था। 1975 से लेकर 2007 तक इसके ऊपर 235 से ज्यादा लूट, मर्डर, नरसंहार, किडनैपिंग और वसूली के मामले दर्ज थे। 70 के दशक से अपराध की दुनिया में एक्टिव ददुआ बेहद क्रूर था। जनार्दन सिंह के सरेंडर के बाद 1982 में उसने अलग गैंग बनाया। आरोप है कि गैंग के एक बदमाश की गिरफ्तारी के बाद ददुआ ने रामू का पुरवा गांव में 19 जुलाई 1986 को साथियों के साथ 9 लोगों को गोली मार दी थी। 1992 में उसने मड़ैयन गांव में 3 लोगों को मारने के बाद गांव को आग लगा दी थी। उसने 24 से ज्यादा पुलिस मुखबिरों को मार डाला था।
ददुआ का राजनीति में था दखल
ददुआ ने कुर्मी (पटेल) जातिवाद का कार्ड खेलकर इलाके में पैठ बनाई। पॉलिटिकल एनालिस्ट दिनेश कहते हैं, 1982 से लेकर 2007 तक ददुआ ने हर चुनाव में फरमान जारी किए। मोहर लगेगी... ... पर, वरना गोली पड़ेगी छाती पर जैसे नारों वाले फरमान की चर्चा आज तक है। कहते हैं कि यूपी के मिर्जापुर, कौशांबी, चित्रकूट, बांदा, फतेहपुर, रायबरेली, पट्टी (प्रतापगढ़) के कुर्मी बहुल इलाकों में उसका ही असर था। यूपी-एमपी की 15 विधानसभा और लोकसभा की 10 सीटों पर उसके इशारे पर ही वोट डलते थे। उसे एक पार्टी का संरक्षण हासिल था। कहा जाता था कि ददुआ की गोली अपनी जाति के लोगों को सिर्फ तब लगी, जब उन्होंने मुखबिरी की।
पूरे कुनबे को करा दी राजनीति में इंट्री
ददुआ का भाई बालकुमार पटेल (पूर्व सांसद) बेटा वीरसिंह पटेल (पूर्व एमएलए, चित्रकूट) बहू ममता पटेल (पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष, कर्वी) बेटी चिरौंजी देवी (पूर्व प्रमुख, धाता ब्लॉक, फतेहपुर) भतीजा रामसिंह पटेल (पूर्व एमएलए, प्रतापगढ़) भतीजा राकेश सिंह पटेल (पूर्व एसपी छात्र सभा अध्यक्ष, रायबरेली) से हैं। पूर्व डीजीपी विक्रम सिंह ने तेज तर्रार आईपीएस अमिताभ यश को ददुआ को मारने का जिम्मा सौंपा था। करीब तीन महीने जंगलों की खाक छानने के बाद 22 जुलाई 2008 में 22 एसटीएफ के जवानों ने मिलकर ददुआ को मार गिराया।
Published on:
10 Jul 2018 09:59 am
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