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जर्रे-जर्रे पर मौजूद है दोनों की कहानी, जानिेये राजा ययाति व उनकी प्रमिका देवयानी की प्रेमकहानी

जाजमऊ के राजा ययाति ने अपनी प्रमिका देवयानी के कहने पर एक भव्य सरोवर की अधारशिला रखी थी।

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kanpur

कानपुर. जिस तरह शहंशाह ने अपनी बेगम की यादव में ताजमहल का निर्माण करवाया, उसी तरह से जाजमऊ के राजा ययाति ने अपनी प्रमिका देवयानी के कहने पर एक भव्य सरोवर की अधारशिला रखी थी और आज भी वह धरोवह कानपूर के मूसानगर में मौजूद है। यहां पर लोग अपने पूर्वजों का पिंडदान करने को आते हैं। बताया जाता है कि राजा शिकार के लिए निकले थे, इसी दौरान कुएं से अंदर से एक युवती की आवाज सुनाई दी। राजा ने अपने सैनिकों को रोक कर कुएं के अंदर देखा तो वहां दैम्य गुरू शुक्राचार्य की बेटह पानी के अंदर जिंदगी और मौत के बीच जूझ रही थी। ययाति कुएं में छलांग लगा दी और उसे बाहर लाए। राजा को देखते ही देवयानी उन पर फिदा हो गई और दोनों ने विवाह कर लिया। लेकिन विवाह के बाद देवयानी के चलते ययाति को अपनी जवानी भी गवानी पड़ी थी।


मूसानगर में दोनों के बीच हुई थी मुलाकात
इतिहासकार मनोज कपूर ने बताया कि महाभारत काल के दौरान दैत्य गुरू शुक्राचार अपनी बेटी देवयानी को मित्र राजा वृषपर्वा की बेटी शर्मिष्ठा के साथ मूसानगर घूमने के लिए आए थे। राजा और शुक्राचार्य की बेटियों के बीच गहरी दोस्ती हो गई। एकदिन दोनों स्नान करने के लिए नदी गई, तभी तेज आंधी ने उनके वस्त्रों को इधर-उधर कर दिया। भूलवस देवयानी ने शर्मिष्ठा के वस़्त्र धारण कर लिए। जिसके चलते वह क्रोधित हो गई और उन्हें कुएं में धक्का देकर चली गईं। इसी दौरान राजा यायाति वहां से गुजर रहे थे तो कुएं से बचाने की आवाज सुनी तो वह रूक गए। कुएं के पास जाकर देखा तो एक युवती पानी में तैर रही थी। ययाति कुएं में कूदकर देवयानी को बचाया। देवयानी ने राजा ययाति को देखकर उनसे प्रेम कर बैठी और विवाह का प्रस्ताव रख दिया। पर दैत्य गुरू का नाम सुनते ही ययाति डर गए और देवयानी के साथ शादी करने से इंकार कर दिया।


कुएं को सरोवर में कराया तब्दील
इतिहासकार कपूर बताते हैं कि, राजा ययाति अपनी प्रेम की निशानी को जीवित रखने के लिए पत्नी देवयानी के नाम से मूसानगर में सरोवर का निर्माण करवाया। जो आज भी यहां पर मौजूद है। शुक्राचार्य ने खुश होकर कहा था कि जब तक धरती रहेगी तब तक यह सरोवर रहेगा और लोग अपने पूर्वजों का पिंडदान करने के लिए यहां आएंगे। मूसानगर में स्थित देवयानी सरोवर में पितरपक्ष के दौरान सैकड़ों लोग आते हैं और अपने पूर्वजों का पिंडदान करते हैं। इतिहासकारों की मानें तो गुरु शुक्राचार्य ने देवयानी का हाथ देने से पहले ययाति के सामने शर्त रखी कि जीवन में कभी भी ययाति की वजह से देवयानी के आंख से एक भी अश्रु बहना नहीं चाहिए। ययाति ने यह शर्त सहर्ष मान ली अतः देवयानी और ययाति का विवाह हो गया और जाजमऊ की रानी का राज यहां पर रहा।


जाजमऊ की राजा थे ययाति
इतिहासकार के मुताबिक ययाति, चन्द्रवंशी वंश के राजा नहुष के छः पुत्रों याति, ययाति, सयाति, अयाति, वियाति तथा कृति में से एक थे। ययाति का विवाह शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी के साथ हुआ।ं, इतिहासकार मनोज कपूर बताते, हैं कि जाजमऊ राजा ययाति की राजधानी हुआ करती थी। ययाति से ही आगे चंद्रवंश चला जिसमें से यदुओं, तुर्वसुओं, आनवों और द्रुहुओं का वंश चला। जिस तरह बाइबल में याकूब के 12 पुत्रों से इसराइल-अरब की जाति बनी, उसी तरह ययाति के 5 पुत्रों से अखंड भारत (अफगानिस्तान, पाकिस्तान, हिन्दुस्तान, बांग्लादेश, बर्मा, थाईलैंड आदि) की जातियां बनीं। राजा ययाति का किला आज भी जाजमऊ में मौजूद है।


शमिष्ठा से किया विवाह
देवयानी के साथ विवाह करने के बाद ययाति उन्हें लेकर जाजमऊ आ गए। लेकिन देवयानी अपने साथ शमिष्ठा को भी ले आईं। एक दिन अचानक राजा ययाति और शर्मिष्ठा का आमना-सामना हुआ और ययाति उन पर फिदा हो गए। उन्होंने देवयानी के सहेली के साथ विवाह कर लिया। शर्मिष्ठा और ययाति के विवाह की हकीकत देवयानी को पता चली तो उन्होंने पिता को दोनों के रिश्ते के बारे में बता दिया। शुक्राचार्य ने क्रोधावेग में ययाति को श्राप देकर उसकी जवानी छीन ली। ययाति उनके सामने गिड़गिड़ाए और माफी मांगी। शुक्राचार्य को उन पर तरस आ गया और कहा कि ‘मैं दिया गया श्राप वापस तो नहीं ले सकता लेकिन अगर तुम्हारा कोई पुत्र तुम्हें अपनी जवानी देता है तो तुम जब तक चाहो तब तक जवान रह सकते हो’।


राजा पुरू ने पिता को दी जवानी
ययाति अपने महल पहुंचा और सबसे पहले अपने बड़े पुत्र से कहा कि वह उसे अपनी जवानी दे दे। उसके सभी बेटों ने उसका आग्रह टाल दिया लेकिन सबसे छोटा पुत्र पुरु इस बात के लिए राजी हो गया। पुरु ने अपने पिता ययाति को अपनी जवानी दे दी और स्वयं वृद्ध हो गया। ययाति ने अपनी जवानी का भरपूर आनंद उठाया लेकिन एक दिन उसे अपनी गलती और पुत्र के प्रति किए गए अन्याय का एहसास हुआ। ययाति आत्मग्लानि में अपने पुत्र के पास पहुंचा और उसे कहा कि वह अब और ज्यादा जवान नहीं रहना चाहता। पुरु को उसकी जवानी वापस की और उसे राजपाठ सौंपते हुए ब्रह्म की उपासना करने के लिए सम्राट ययाति जंगल की ओर प्रस्थान कर गया और अपना संपूर्ण जीवन वहीं बिताया।