
जायरीनों के लिए रहस्य बना चमत्कारी कटोरा के साथ पाकड़ वृक्ष
कानपुर। घंटाघर से करीब 40 किमी की दूरी पर स्थित बिल्हौर तहसील क्षेत्र के मकनपुर में सैय्यद बदीउद्दीन जिंदा शाह मदार की दरगाह पर दम मदार बेड़ा पार की गूंज के साथ 603 वां उर्स की शुरुआत हो गई। करीब दो लाख अकीदतमंद यहां पर पहुंच चुके हैं । उर्स में जायरीनों और मलंगों के आने और दरगाह में मत्था टेकने और चादर चढ़ाने की सिलसिला जारी हो गया है। यहां पर सैकड़ों साल पुरानी वस्तुएं मौजूद हैं, जो लोगों के आकर्षण का केंद्र बनी हैं। इन्हीं में से हजरत का एक कटोरा है, जो खाने में मिले जहर की पहचान कर लेता है। इसके रहस्य से पर्दा उठाने के लिए देश ही नहीं विदेश से वैज्ञानिक आए पर चमत्कारी कटोरे के इस अदभुत चमत्कार को खोज नहीं पाए।
माथा टेककर मांग रहे मन्नत
मकनपुर स्थित हजरत सैयद बडिउद्दीन जिंदाशाह मदार की दरगाह पर उर्स के पांचवें दिन गुरूवार की सुबह से ही दूर दराज से आए जायरीनों द्वारा माथा टेकने के साथ ही मन्नत मांगने का सिलसिला जारी है। दरगाह परिसर में लगे पाकड़ वृक्ष पर जायरीन धागा बांधकर मन्नत मांगते हैं। रिसर में ही संग्रहालय स्थित है जिसमे कई तरह की बाबा मदार साहब से जुड़ी वस्तुएं रखी हैं, जिसमे जहर को पहचान करने का कटोरा आकर्षण का केंद्र बना हुआ हैं। जिसे देखने के लिए जायरीनों को लाइन लगानी पड़ रही है। अब तक करीब पांच लाख से ज्यादा अकीदतमंदों ने बाबा के दर पर आकर माथा टेक चुके हैं।
जहर मिला खाना पड़ जाएगा काला
जिंदा शाह की मदार में ऐसे-ऐसे समान रखें हैं, जिन्हें देखनें और शोध करने के लिए साइंटिस्ट पहुंचते हैं, पर रहस्यों के बारे में आजतक पर्दा नहीं उठा पाए। मकनपुर शरीफ में जनाब अकदस लंबे समय से यहां की नयाब चीजों को सुरक्षित रखे हुए हैं। इसमें मदार साहब के व्यक्तिगत इस्तेमाल का एक कटोरा भी है। जिसकी खासियत यह है कि वो जहर को पहचान लेता है। कमेटी के सदस्य मजाहिर हुसैन ने बताया कि प्रोफेसर मजहर अब्बास नकवी यहां पिछले तीन दशक से शोध कर रहे हैं पर आज तक इस रहस्य से पर्दा नहीं उठा सके। बताते हैं कि यदि खाना और पानी में जहर मिला हो और उसे प्याले में रखते ही रंग बदल जाता है। कई सांइटिस्टों ने इस पर शोध किया लेकिन इस रहस्य से कभी उजागर नहीं कर पाए।
मेले का इतिहास पुराना
कमेटी के सदस्य मजाहिर हुसैन ने बताया कि भारत में मेले का इतिहास काफी पुराना रहा है। यह मेले हिंदुस्तानी सभ्यता का हिस्सा रहे हैं, जिसमें सबसे अहम कुंभ का मेला है। इन मेलों को तरक्की हजरत जिंदा शाह मदार के हिंदुस्तान में आने के बाद मिली और मेला के साथ मदार नाम जुड़ा। आम बोलचाल में लोग आज भी मेला मदार जाने का जिक्र करते हैं। उन्होंने बताया कि हजरत जिंदा शाह मदार लगभग 282 हिजरी में भारत पहुंचे और भारत भ्रमण के बाद मकनपुर शरीफ आए थे। मकनपुर में मदार साहब के दुनिया से पर्दा कर जाने के बाद शर्की हुकूमत के दौर में दरगाह का निर्माण किया गया। इसके बाद मदार साहब को मानने वाले लोग मकनपुर पहुंचने लगे और मेलों का दौर शुरू हो गया।
धागा बांधते ही मन्नत हो जाती पूरी
हजरत सैय्यद बदीउद्दीन जिंदा शाह मदार की दरगाह के पास एक सैकड़ों वर्ष पुराना पाकड़ वृक्ष खड़ा हुआ है। मान्यता है कि जो भी व्यक्ति यहां आकर धागा बांध दे तो उसकी हर समस्या का समाधान हो जाता है। आने वाले जायरीन पाकड़ वृक्ष में धागा बांधकर मन्नत मांगते हैं। आशिफ बताते हैं कि वह हरवर्ष मेले पर यहां परिवार के साथ आते हैं और एकदिन रूकते हैं। दरगाह में माथा टेकने के बाद पाकड़ वृक्ष में धागा भी बांधते हैं। वहीं इटावा से आए अभय कुशवाहा ने बताया कि मां बीमार थी। छोटे-बड़े अस्पतालों में इलाज करवाया पर आराम नहीं मिला। पिछले वर्ष बाबा के दर पर आए और माथा टेकने के बाद पाकड़ वृक्ष में धागा बांधा। मां इसके बाद पूरी तरह से स्वस्थ्य हो गई।
ईशन नदी में लगाते हैं डुबकी
कमेटी के सदस्य मजाहिर हुसैन ने बताया कि ईशन नदी में स्नान के बाद दरगाह में माथा टेकने की परंपरा है। बताते हैं, बुधवार को नासिक से आये जायरीनों ने माथा टेककर चादर चढ़ाई। उन्होंने बताया कि उर्स में भारत ही विदेशों से भी लोग आते हैं। गुजरात, राजस्थान, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश, बहेड़ी, बरेली, मुरादाबाद, लखनऊ, सीतापुर, लखीमपुर खीरी और नासिक से जायरीन मकनपुर पहुंचे हैं। सदस्य मजाहिर हुसैन ने बताया कि उर्स में शिरकत करने वाले मलंग दरगाह शरीफ में बनी कोठरियों में रुकते हैं। जायरीनों के लिए मुसाफिर खाना व अलग से टेंट की व्यवस्था की गई है।
Published on:
16 Jan 2020 08:16 am
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