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दंगल से लेकर राजनीति में कभी हार न मानने वाले धरती पुत्र मुलायम फिर से दौड़ाएंगे साइकिल

राजनीति में चरखा दांव से बड़े से बड़े दिग्गज को दे चुके हैं मात, यूपी से कांग्रेस का किया सफाया और समाजवाद की नींव रख नेता जी कहलाए।

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mulayam singh yadav life story in admitted to medanta hospital

दंगल से लेकर राजनीति में कभी हार न मानने वाले धरती पुत्र मुलायम की बिगड़ी तबियत

कानपुर। मुलायम सिंह बीहड़ और चंबल के बीच राजनीति का ककहरा सीखा। 15 साल की उम्र में नहर आंदोलन में शामिल हुए और जेल गए। पिता ने अखाड़े में पहलवानी की दांव-पेंच सिखाए तो बड़े-बड़े पहलवानों को पटखनी देकर सुल्तान कहलाए। फिर राजनीति में कदम बढ़ाए और उस दौर की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस को चित्त करने कर सूबे में समाजवाद को मजबूत किया। इसी का नतीजा है कि 1989 के बाद प्रदेश में कांग्रेस फिर खड़ी नहीं हो सकी और 2019 के लोकसभा चुनाव में महज एक सीट पर सिमट गई। पर दंगल से लेकर सियायत में कभी हार न मानने वाले धरती पुत्र मुलायम पिछले कुछ दिनों से बीमार चल रहे हैं। उनके समर्थक निराश। पूर्व सवा विधायक मदन गोपाल उमराव कहते हैं कि घर के अंदर रार और पार्टी की हार के चलते नेता जी परेशान रहते हैं। हां हमें उम्मीद है कि किसानों के नेता फिर से खड़े होंगे और यूपी में समाजवाद का झंडा बुलंद करेंगे।

कांग्रेस का यूपी से किया सफाया
जहानाबाद से सीट तीन बार सपा से विधायक रहे यशोदा नगर निवासी मदन गोपाल उमराव कहते हैं कि जब नेता जी राजनीति में आए तो उनके परिवार का कोई भी व्यक्ति दूर-दूर तक सियासत में नहीं था। उन्होंने गांव, गरीब, किसान और मजदूरों के लिए संघर्ष किया। कांग्रेस के खिलाफ अकेले लड़े और जिसका परिणाम रहा कि यूपी में 90 के दशक के बाद से कांग्रेस का पूरी तरह से सफाया हो गया। पूर्व विधायक ने बताया कि वो पिछले 35 साल से सपा के साथ जुड़े हैं और अपने नेता के बताए रास्ते पर चल रहे हैं। नकी तबियत जल्द से जल्द ठीक होगी और आने वाले वक्त में परिवार के सारे झगड़े खत्म हो जाएंगे। शिवपाल यादव अभी भी सपा से विधायक हैं।

किसानों के बड़े नेता के रूप में मिली पहचान
मुलायम सिंह यादव की सियासत का केंद्र गांव रहे। ग्रामीणों की समस्याओं को लेकर आंदोलन किया और जेल भी गए। पुलिस ने पीटा पर उनके इरादे कमजोर नहीं पड़े। पूर्व विधायक बताते हैं कि फर्रूखाबाद में किसानों की जमीन पर गांव के दबंगों ने कब्जा कर लिया। नेता जी को जानकारी मिली तो वो मौके पर गए और रसूखवालों से सीधा मोर्चा लिया। जिसके कारण उनके खिलाफ मुकदमा भी दर्ज हुआ। कहते हैं मुलायम सिंह की जब भी रैली होती थी तो ग्रामीण घरों में तालाबंद कर उन्हें सुनने के लिए बैलगाड़ी लेकर पहुंचते थे। यही वजह रही कि पिछले चार दशक से यूपी में उनके इर्द-गिर्द सियासत घूमी।

सुधर सिंह के घर में लिया जन्म
मुलायम सिंह यादव का जन्म 22 नवम्बर 1939 को इटावा जिले के सैफई गांव में मूर्ति देवी व सुधर सिंह के किसान परिवार में हुआ था। मुलायम सिंह अपने पाँच भाई-बहनों में रतनसिंह से छोटे व अभयराम सिंह, शिवपाल सिंह, रामगोपाल सिंह और कमला देवी से बड़े हैं। पहलवानी में अपने राजनीतिक गुरु नत्थूसिंह को मैनपुरी में आयोजित एक कुश्ती-प्रतियोगिता में प्रभावित करने के बाद उन्हीं के पदचिन्हों पर चल कर राजनीति शुरू कर दी। मुलायम सिंह यादव की दो शादियां हुईं पहली शादी मालती देवी से जिनके बेटे हैं प्रदेश के वर्तमान मुख्यमंत्री अखिलेश यादव, दूसरी पत्नी हैं साधना गुप्ता जिससे उन्होंने लंबें प्रेम संबंध के बाद 2003 में मालती देवी के निधन के बाद शादी की।

पहले गैर कांग्रेसी सीएम बनें
समाजवादी राजनेता राम मनोहर लोहिया के विचारों से प्रभावित रहे मुलायम सिंह ने अपने राजनीतिक सफ़र में पिछड़ी जातियों और अल्पसंख्यकों के हित की अगुवाई कर अपनी पुख्ता राजनीतिक ज़मीन तैयार की। मुलायम सिंह उन गैर कांग्रेसी नेताओं में से एक हैं जो एक से ज्यादा बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने हैं। वे अपने पहलवानी के आर्दश गुरु नत्थूसिंह के पदचिन्हों पर चलते हुए देश की राजनीति में सक्रिय हुए। उन्होंने नत्थूसिंह के ही परम्परागत विधान सभा क्षेत्र जसवन्त नगर से अपना राजनीतिक सफर भी आरम्भ किया था। इसके बाद मुलायम सिंह ने साइकिल का हैंडिल थामा और गांवों के अंदर खुद को मजबूत कर कांग्रेस का सफाया कर दिया।

मुस्लिमों को भाए मुलामय
1992 में मुलायम सिंह ने जनता दल से अलग होकर समाजवादी पार्टी के रूप में एक अलग पार्टी बनाई। जब तक मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री रहे उन्होंने बाबरी मस्जिद के ढांचे को कोई आंच नहीं दी। मुलायम सिंह ने कार सेवकों पर साल 1990 में उन्होंने गोली चलाने का आदेश दिया जिसमें एक दर्जन से ज्यादा लोग मारे गए थे, हालाकि इसका उन्हें जबरदस्त राजनीतिक लाभ हुआ समाजवादी पार्टी को मुस्लिमों का बिना शर्त सर्मथन प्राप्त हो गया। इसी के बाद इन्हें कुछ लोग मुल्ला मुलायम के नाम से पुकारने लगे। पर मुलायम का ऐ फैसला समाजवादी पार्टी की जमीन को मजबूत कर गया। जब से इस वर्ग का वोट अन्य दलों के बजाए सपा को ही पक्ष में पडता आ रहा है।

लालू के चलते नहीं बन पाए पीएम
मुलायम सिंह ने उत्तर प्रदेश में पिछड़े वर्गों का सामाजिक स्तर को उपर करने में महत्वपूर्ण कार्य किया है। 1967 में वे पहली बार विधान सभा के सदस्य चुने गये और मन्त्री बने। 1992में उन्होंने समाजवादी पार्टी बनाई। वे तीन बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमन्त्री रहे। पहली बार 5 दिसम्बर 1989 से 24 जनवरी 1991 तक, दूसरी बार 5 दिसम्बर 1993 से 3 जून 1996 तक और तीसरी बार 29 अगस्त 2003 से 11 मई 2007 तक। 1996 में मुलायम सिंह यादव ग्यारहवीं लोकसभा के लिए मैनपुरी लोकसभा क्षेत्र से चुने गए थे और उस समय जो संयुक्त मोर्चा सरकार बनी थी, उसमें मुलायम सिंह भी शामिल थे और देश के रक्षामंत्री बने थे। जब लालू यादव के चलते मुलायम सिंह यादव प्रधानमंत्री नहीं बन पाए।

घर में रार
साल 2012 में उत्तर प्रदेश में हुए विधानसभा चुनाव में 403 में से 226 सीटें जीतने बाद मुलायम सिंह ने खुद चौथी बार मुख्यमंत्री बनने के बजाय अपने बेटे अखिलेश यादव को पद पर बैठाया। उनके हर फैसले ने प्रदेश की ही नहीं बल्कि देश की भी दशा और दिशा बदली। हाल ही में मुलायम सिंह यादव परिवार में वर्चस्व की लड़ाई को लेकर जबरदस्त कलह चल रही है। जिसके कारण समाजवादी पार्टी को पहले 2017 के विधानसभा और फिर 2019 के लोकसभा चुनाव में नुकसान उठाना पड़ा है। मुलायम अब अखिलेश और शिवपाल का एक करने के लिए लगे हैं।