
कानपुर. इतिहास हमें अक्सर आईना दिखाता है और अच्छा यह है कि हम अक्स देखते हुए बहुत कुछ सीखते और गढ़ लेते हैं, लेकिन इतिहास के अनगिनत पन्नों में सुबह की तारीख का जिक्र कम मिलता है। भारत के के इतिहास में कानपुर की एक खास सुबह को बड़े गुमान से जगह दी गई है। यह सवेरा आज से ठीक 156 साल पहले 1857 को आया था। यहां मराठा क्रांतिकारी नानाराव पेशवा ने अंग्रेज हुकूमत के खिलाफ आजादी का बिगुल फूंका जो पूरे देश में आग की तरह फैल गया। इस दौरान सैकड़ों सपूत सिर पर कफन बांधकर निकल पड़े और जो भी आया उसे मारते गए। ऐसे ही एक इलाका शहर के बीचो-बीच बने नानाराव पार्क है, जिसका असली नाम तात्या टोपे मेमोरियल गार्डन है। यहीं से नाना के सैनिकों ने जंग-ए-आजादी की लड़ाई की शुरूआत की थी और दुश्मनों को सबक सिखाया था। नाना के जांबाज महिला सिपाही ने 200 से ज्यादा अंग्रेज महिलाओं को जिंदा कुएं के अंदर दफन कर दिया था। इसी से गुस्साए अंग्रेजों ने यहीं पर बरगद की टहनियों पर 133 क्रांतिकारियों को लगटा दिया था। कुआं और बरगद तो अब पार्क के अंदर नहीं रहा, लेकिन वह निशानियां आज भी यहां मौजूद हैं।
फूलबाग को बनाया था ठिकाना
इस सुबह के बाद नया विहान बेशक नौ दशक बाद 15 अगस्त, 1947 को आया, लेकिन बिठूर से इस मराठा क्रांतिकारी की गदर ने ब्रितानी हुकूमत के भाल पर यह अमिट संदेश उकेर दिया कि दासता की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है। आइए, करीब डेढ़ सदी पहले की उस सुबह की सैर पर निकलते हैं। ब्रितानी हुकूमत के जुल्म-ओ-सितम से छटपटाते तत्कालीन हिंदुस्तान के कई स्थानों पर असंतोष का लावा पक रहा था। बंगाल की बैरकपुर सैन्य छावनी में मंगल पांडे की बगावत की चिंगारी कानपुर पहुंची और बिठूर के पेशवा महल से 1857 में आजादी का बिगुल फूंका गया था। क्रांतिकारी बिठूर से निकल कर कानपुर के बीचों-बीच बने फूलबाग में अपना ठिकाना बना लिया। इतिहासकार मनोज कपूर ने बताया कि नानाराव पार्क का असली नाम तात्या टोपे मेमोरियल गार्डन है। यहां आज भी 1857 के गदर के वक्त अंग्रेज हुकूमत के खिलाफ नानाराव और तात्या टोपे रहकर रणनीति बनाया करते थे। यहां से बिठूर तक क्रांतिकारियों ने सुरंग बनाई थीं और जब भी अंग्रेजों से नाना के सैनिक घिर जाते तो इन्हीं के जरिए भाग कर बिठूर पहुंच जाते थे। इसी पार्क में अंग्रेजों की महिलाओं का मारा गया तो गुस्से में अंग्रेज हूकूमत ने 135 क्रांतिकारियों को बरगद के पेड़ पर फांसी दी थी।
इस महिला ने कांड को दिया था अंजाम
इतिहासकार ने बताया 1857 में 27 जून से 15 जुलाई तक नानाराव पेशवा ने लगभग 200 अंग्रेज महिलाओं और बच्चों को यहां बीबीघर बंदी बनाकर रखा था। लेकिन नाना की महिला सिपाही हुसैनी खानम बेगम अंग्रेज फाजियों की करतूत से क्रोधित होकर अपने चार अंगरक्षकों की मदद से 15 जुलाई 1857 को देर शाम बीबीघर में रह रही सभी महिलाओं और बच्चों के मौत के घाट उतार दिया और 16 जुलाई की सुबह शवों को कुएं में डाल दिया गया। अब बीबीघर के स्थान पर स्वीमिंग पूल है। प्रशासन स्वीमिंग पूल के आसपास के स्थान को बीबीघर बताता है पर जानकार बताते हैं कि स्वीमिंग पूल के नीचे आज भी बीबीघर का इतिहास दफन है। आजादी से पहले फूलबाग को क्वीन्स पार्क के नाम से जाना जाता था। इसे 1890 में बनाया गया था। आजादी के बाद इस बिल्डिंग पर झंडा फहराया जाता था। सभाएं होती थीं। 2000 के आसपास यहां म्यूजियम बनाकर गदर की कहानी बयां करतीं कई ऐतिहासिक धरोहरें रखी गई थीं, जिसे बंद कर दिया गया।
133 क्रांतिकारियों की बरगद पर लटकाया
बीबीघर कांड को लेकर इंग्लैंड में भारी आक्रोश था, वहां सड़कों पर होने वाले नाटक में नानाराव के पुतले को फांसी पर लटकाया जाता था। बढ़ते दबाब को देखते हुए अंग्रेजों ने कई बार नकली नानाराव को पकड़कर फांसी पर लटका दिया, लेकिन असली नानाराव कभी अंग्रेजों के हाथ नहीं लगे। इसी दौरान अंग्रेजी हुकूमत ने करीब 133 क्रांतिकारियों को नानाराव पार्क में मौजूद बरगद के पेड़ पर एक साथ फांसी दे दी। यहां पर पुरातत्व विभाग ने अंग्रेजियत दर्शाने के लिए एक देवदूत की प्रतिमा लगाकर नक्काशीदार रेलिंग के साथ मेमोरियल वेल पार्क स्थापित कर दिया। जिसका नाम अब नानाराव पार्क है। यहां विद्रोहियों का दमन करने को क्रूर अंग्रेज हैवानियत पर उतर आए थे। हालांकि बाद में गुस्साए विद्रोहियों ने यहां हमला बोलकर काफी कुछ तहस-नहस कर दिया। स्मारक को संरक्षित करने की नाकाम कोशिशें हुई। अब बीबीघर के स्थान पर स्वीमिंग पूल, लाशों के कुएं पर स्केटिंग रिंग व बूढ़े बरगद के स्थान पर सिर्फ इबारत लिखा पत्थर लगा है।
आज भी मौजूद हैं कई निशानियां
स्वतंत्रता संग्राम की ढेरों निशानियां नानराव पार्क में आज भी मौजूद हैं। यहां पार्क में स्थापित स्मारकों और प्रतीक शिलालेखों की सहेज कर रखने वाले नहीं हैं। जिसके कारण कई प्रतीकों और स्मारकों के चारों ओर काई और खरपतवार उग गए हैं। कई शिलालेखों के पत्थर भी चिटक चुके हैं। क्रांतिकारी कुमार बनर्जी की मूर्ति पर लगे पत्थर की पूरी इबारत उखड़ चुकी है। झांसी की रानी और नानाराव पेशवा की बेटी वीरांगना मैनावती की प्रतिमा गंदी पड़ी है। सुभद्रा कुमारी चौहान द्वारा लिखित झांसी की रानी की गाथा 'सिंहासन हिल उठे...’ के निशान मिट रहे हैं। श्याम लाल पार्षद द्वारा लिखे 'झंडा गीत’ के स्मारक के आसपास गंदगी फैली है। वीर मंगल पांडेय और शहीद शालिगराम की प्रतिमाएं पौधों में छिप चुकी हैं। माखन लाल चतुर्वेदी की कविता 'चाह नहीं मैं सुरबाला के...’ की शिला भी खराब हो रही है। वहीं, फूलबाग में गांधी जी की प्रतिमा स्थल के बाहर का चौबारा टूटा पड़ा है।
Updated on:
24 Jan 2018 10:59 am
Published on:
24 Jan 2018 10:58 am
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