
नर्वल आश्रम में आज भी जिंदा हैं गांधीजी की यादें
कानपुर। आज 2 अक्टूबर के अवसर पर जब जिक्र चला है महात्मा गांधी की यादों का, तो ऐसे में कानपुर में बसे नर्वल आश्रम को भला कैसे भूला जा सकता है. आपको बता दें कि नर्वल के गणेश सेवा आश्रम में गांधीजी दो बार गए. दूसरी बार बापू के साथ आई बा को यह आश्रम बहुत ही अच्छा लगा. ये बेहद यादगार है कि गांधीजी ने यहां बेल के पेड़ के नीचे बैठकर रघुपति राघव राजाराम धुन की मधुर आवाज़ के बीच चरखा भी काता. यह स्थान आज भी जैसा का तैसा मौजूद है. देश की आजादी के बाद आश्रम बापू के विचारों, खादी के साथ गांधीजी की यादों को संजोये बागे बढ़ता रहा. आठवें दशक के बाद से आश्रम की दशा दयनीय होती गई. हालात यह हैं कि अब आश्रम को लेकर गांधीजी के सपने धुंधले पड़ते जा रहे हैं.
गांधीजी को बहुत प्रिय था ये आश्रम
झंडागीत के रचयिता श्यामलाल गुप्त पार्षद के गांव में बने गणेश आश्रम में गांधीजी आए थे तो उस वक्त ये गांधीवाद, राजनीतिक, सामाजिक और ग्रामोद्योग की चेतना का गढ़ था. यही वजह थी कि गांधीजी को यह आश्रम बहुत प्रिय था. यहां वह कई बार आए. वर्तमान में हालात ये हैं कि गांधीजी के नाम पर यादागार ये भवन पूरी तरह से मरम्मत मांग रहा है. गांधीघर में भी सन्नाटा ही रहता है. यहां पर सामान रखा जाता है.
गांव वाले करते हैं बहुत गर्व
कहने को तो अभी भी आश्रम में सूत कातने के चरखे लगे हैं, लेकिन कुछ गिनी-चुनी महिलाएं और पुरुष ही यहां काम करते नजर आते हैं. गांधीजी का चित्र यहां के कमरे में लगा है. यहां के गांव वाले आश्रम पर बहुत गर्व करते हैं. गांधीजी को आश्रम में लाने का श्रेय श्यामलाल गुप्त पार्षद और गणेश शंकर विद्यार्थी को दिया जाता है. लोग बताते हैं कि इस आश्रम का सपना साबरमती के आश्रम की तर्ज पर देखा गया था.
आजादी के बाद भी यहां होता था ये काम
श्यामलाल पार्षद के नवासे साकेत गुप्त कहते हैं कि आश्रम के कमरे जर्जर हो चुके हैं. यहां पर कभी 500 से ज्यादा महिला पुरुष काम करते दिखते थे. हथकरघों की आवाज़ आती रहती थी. महिलाओं की खासी संख्या सूत कातने को इकट्ठा होती थी. पूरे प्रदेश में गणेश सेवा आश्रम के उत्पाद छाए थे. 1975 के बाद यहां की रौनक खत्म होती गई.
गोविंद बल्लभ पंत का है ऐसा योगदान
भवन की हालत को सुधारने के लिए पूर्व मुख्यमंत्री गोविंद बल्लभ पंत ने 1956 में 5000 रुपए दिए थे. यहां कभी गणेश शंकर विद्यार्थी हफ्ते में तीन दिन आते थे. पार्षदजी उन्हें कभी सरसौल स्टेशन से साइकिल से लेने जाया करते थे. इस आश्रम ने गांव वालों को रोजगार दिया था. आश्रम में अनाज का उत्पादन भी होता था. नीम का साबुन किसी ब्रांडेड कंपनी की टक्कर में बिकता था. यहां के तेल, मंजन, उत्पाद छाए थे.
Updated on:
02 Oct 2018 12:08 pm
Published on:
02 Oct 2018 12:07 pm
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