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कानपुर की इस बस्ती की अगज-गजब की प्रथा, भिक्षा की दिक्षा के बाद शादी के फेरे लेते हैं युवा

भिक्षा की दिक्षा के बाद ही बंधता है सेहरा, बच्चों से लेकर बुजर्ग सभी के पास रोजी-रोटी का साधन भीख

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भिक्षा की दिक्षा के बाद ही बंधता है सेहरा, बच्चों से लेकर बुजर्ग सभी के पास रोजी-रोटी का साधन भीख

कानपुर। भोर का पहर था और बस्ती के बाहर कुछ युवक चिमनी की रोशनी में माथा-पच्ची करते हुए दिखे। एक बुजुर्ग ने उन्हें कुछ पढ़ा रहा था, तभी उसकी नजर हम पर पड़ी तो वह चिल्लाकर दौड़ पड़ा। आते ही उसने हमारा नाम पता पूछा और जानकारी के बाद कुछ देर तक वह खड़े-खड़े निहारता रहा और फिर बस्ती में आने को कहा। बुजुर्ग अपनी झोपड़ी के बाहर चबूतरे में बैठ गया और फिर उसने कपड़िया समुदाय की सैकड़ों साल पुरानी परम्परा का बखान करने लगा। बुगुर्ज ने बताया कि हम घुंमतू समुदाय से ताल्लुख रखते हैं और करीब दो सौ साल पहले कानपुर के जमीदार मानसिंह ने हमें यहां पर बसाया था। इसी के बाद यही हमारा ठिकाना हो गया। बस्ती में सभी पुरूष और युवक भिक्षा मांग कर अपना भरण पोषण करते हैं। इसके लिए आठ साल से बच्चों को शिक्षा देनी शुरू कर दी जाती है और शादी का उम्र आते-आते वह पूरी तरह साधू की तरह दिखने और भिक्षा की कला से दक्ष हो जाते हैं। इसके बाद बस्ती की ही युवतियों के साथ उनका विवाह करा दिया जाता है। एक साल तक युवक को अपनी पत्नी के परिजनों को भीख की रकम का कुछ हिस्सा देना होता है। साथ ही जो युवक भिक्षा की प्रथा को नहीं अपनाता तो उसका विवाह नहीं होता।
दो सौ साल से चली आ रही परम्परा
दो दशक पहले देश में कई प्रथाएं प्रचलन में थी, जिन्हें सरकारों ने कानून बनाकर खत्म कर दिया। लेकिन कानपुर के पनकी थानाक्षेत्र स्थित कपड़िया बस्ती में दो सौ साल पुरानी प्रथा बदस्तूर जारी है। कपड़िया बस्ती शहर की अन्य बस्तियों से भिन्न हैं। टूटी झोपड़ियां, एक-दो पक्के घर, कच्ची सड़कें, उनके किनारे जमा गन्दा पानी और इधर-उधर खेलते छोटे बच्चे। कुछ नया या अनोखा नहीं दिखता। बस्ती की आबादी क़रीब चार हज़ार के आसपास है। बस्ती में वैसे सबके पास आधार कार्ड और पात्रों को राशन कार्ड की सुविधा मिली हुई है, बावजूद वह अपने आपको आज भी समाज से अगल मानते हैं। बस्ती के बुजुर्ग कल्लू (75) से हमारी मुलाकात होती है। उम्र के आखरी पड़ाव में होने के बावजूद उनचे चेहरे में गजक की चमक थी। बड़ी-बड़ी दाड़ी और रूबीली पूंछों पर ताप फेरते हुए वह हमारी पास आकर बैठ गए और अपने समाज की कहानियां सुनाने लगे। कल्लू बताते हैं कि बस्ती के हर पुरूष के चेहरे पर दाढ़ी है। जो लड़के बड़े हो रहे हैं, वे भी अपने चेहरे पर दाढ़ी उगा रहे हैं। पर भईया यह किसी फ़ैशन की वजह से नहीं है, बल्कि बिना दाढ़ी के कपड़िया बस्ती के लोग ठीक से अपनी रोज़ी रोटी नहीं कमा पाएंगे। यही हमारी जीविका का सहारा है। सुबह होते ही हम सब भीख मांगने के लिए निकल पड़ते हैं और सूरज ढलते ही अपनी बस्ती में आ जाते हैं। भिक्षा में जो मिलता है उसे से दो रोटी खाते हैं।
8 साल से बच्चों को शुरू हो जाती है ट्रेनिंग
भारत में एक साधु की पहचान उसके लंबे केश, बढ़ी हुई दाढ़ी और गेरुआ वस्त्र होते हैं।वे दान या भिक्षा पर ही निर्भर रहते हैं। कपड़िया बस्ती का हर घर भिक्षा पर ही चलता है। कपड़िया बस्ती का हर आदमी रोज़ सुबह साधु के वेश में भिक्षा मांगने निकल जाता है. भीख माँगना ही उसका पेशा है। 65 साल के रामऔतार बताते हैं कि बस्ती में जब बच्चा आठ साल का हो जाता है तो दो घंटे सुबह पहर तो इतने ही घंटे शाम को उन्हें भिक्षा की ट्रेनिंग दी जाती है। घर के बड़े बुजुर्ग उन्हें भीख मांगने की कला सिखाते हैं। 21 से 21 साल की उम्र तक वह पूरी तरह से भिखारी के रूप में परिपक्य हो जाते हैं। रामऔतार बताते हैं जब से बच्चों को दिक्षा देनी शुरू की जाती है तब से उनके सिर और मूंछ के बाल कटवाने पर रोक लगा दी जाती है। 21-22 साल की उम्र में काली दाड़ी और बड़े-बड़े उग आने के चलते वह पूर्णया भिखारी बन जाते हैं। इसी दौरान बस्तियों की युवतियों बुलाया जाता है और वह अपने वर का चुनाव करती हैं। जोड़ों का विधि-विधान के साथ विवाह कराया जाता है और भिक्षा का पैसा युवती के परिजनों को युवक देता है।
देश भर में जाकर मांगते हैं भिक्षा
बस्ती में रहने वाले राम लाल बताया, “हमारे पूर्वज घूमंतू जीवन जीते थे। वे भिक्षा मांग कर ही खाते थे। करीब दो सौ साल पहले वो कानपुर आकर रुके । उस वक्त पनकी के ज़मींदार राजा मान सिंह थे। उन्होंने हमारे पूर्वजों से आग्रह किया की वे पनकी में ही बस जाएं। हमारे पूर्वज उनकी बात माए गए और यहीं बस गए। हर सुबह कपाड़िया बस्ती का हर आदमी गेरुआ वस्त्र ओढ़ लेता है। माथे पर चंदन लगाता है और एक हाथ में कटोरा और दूसरे हाथ में दंड लेकर निकल पड़ता है भिक्षा मांगने। राम लाल ने कहा हम भिक्षा के लिए कानपुर ही नहीं पूरे भारत का भ्रमण करते हैं। नवरात्रों के समय पश्चिम बंगाल जाते हैं तो गणेश पूजा के वक़्त महाराष्ट्र और कुम्भ मेले में इलाहाबाद। वे कहते हैं, दिल्ली में तो हमारा अक्सर आना जाना लगा रहता है,“ और वे दिल्ली के बड़े मन्दिरों के नाम बताने लगते है। कपाड़िया बस्ती में रहने कल्लू कहते हैं, “मैं इसी बस्ती में पैदा हुआ था। मेरे पिता भी इसी बस्ती में पैदा हुए थे।उन्होंने ने भी भिक्षा मांग कर गुज़ारा किया। मैंने भी अपना जीवन भिक्षा मांग के ही चलाया। कल्लू के चार बेटे मंदिरों में भीख मांग के अपना घर चलाते है। बस्ती का कोई भी व्यक्ति शायद ही पढ़ा-लिखा हो। कल्लू कभी स्कूल नहीं गए और उनके बेटे भी स्कूल के बजाए भीख की शिक्षा ली।
पनकी हनुमानमंदिर से शुरूआत
बच्चों को ट्रेनिंग के दौरान परिजन सबसे पहले पनकी मंदिर के बाहर उन्हें भीख मांगने के लिए भेजते हैं और जो सबसे ज्यादा पैसा लेकर आता है उसे उनके गुरू इनाम के तौर पर आधी रकम दे देते हैं। यहां से ट्रेंड होने के बाद युवक कानपुर के बड़े मंदिरों, गुरूद्धारों, लोगों के घरों, बस और रेलवे स्टेशनों में जाकर भीख मांगते हैं। इतना ही नहीं रावतपुर से फर्रूखाबाद रूट पर चलने वाली ट्रेनों में बस्ती के भिखारी रावतपुर रेलवे स्टेशन से सवार हो जाते हैं और एक-एक बोगी में जाकर भीख मांगते हैं। राजन उम्र करीब 25 साल ने बताया कि वो सिॅर्फ ट्रेनों में हर रोज भीख मांगने के लिए जाता है और सात आठ घंटे में पांच सौ से लेकर एक हजार रूपए कमा लाता है। इसी दौरान एक अन्य युवक फदाली से मुलाकात हुई तो उसने बताया कि हम तो झकरकटी बस स्टैंड में सुबह से लेकर देरशाम तक डेरा जमाए रखते हैं। निशल्क में भोजन करते हैं और शाम तक चार से पांच सौ रूपए कमा लेते हैं। राजन ने बताया कि कुछ दिन पहले उसका विवाह हुआ है। खर्चे बड़ गए है इसलिए ज्यादा मेहनत करनी पड़ रही है।