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महारानी विक्टोरिया के ‘गॉड सेव द क्वीन’ का तीखा जवाब था वंदेमातरम्

गोरी हुकूमत ने महारानी के सम्मान में ब्रिटेन और उपनिवेशों में गूंजने वाला गीत भारत के सांस्कृतिक कार्यक्रमों में किया था अनिवार्य

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कानपुर. वंदे मातरम् का उद्घोष वाकई अद्भुत है। इस गीत के गूंजते ही देशभक्ति की लहरें हिलोरें मारने लगती हैं। अंग्रेजों को खदेडऩे के लिए क्रांतिकारियों में जोश पैदा करने के लिए वंदे मातरम् ही जरिया था। आज के दौर में भले ही वंदे मातरम् को मजहब से जोडक़र देखने वालों को राष्ट्रभक्ति के इस नायाब गीत का इतिहास नहीं मालूम है। इतिहास की किताब बताती है कि वंदे मातरम् गीत की रचना गोरी हुकूमत की महारानी की प्रशंसा वाले गीत के अनिवार्य गायन के विरोध में हुई थी। मां की इबादत से लबरेज बंकिमचंद्र चटर्जी के इस गीत को संगीत दिया था रविंद्रनाथ टैगौर ने।


1870 में अंग्रेजों ने अनिवार्य किया था ‘गॉड सेव द क्वीन’ गीत

ब्रिटेन की महारानी के सम्मान में इंग्लैंड और उसके उपनिवेशों में एक गीत गुनगुनाया जाता है। इस गीत का मुखड़ा है - ‘गॉड सेव द क्वीन’। वर्ष 1857 के पहले गदर के बाद अंग्रेजों को भारत में जड़ें कमजोर होती नजर आईं तो मानसिक अत्याचार के लिए तमाम जतन किये गए। इसी दौरान गोरी हुकूमत ने भारत के समस्त सांस्कृतिक कार्यक्रमों में ‘गॉड सेव द क्वीन’ गीत का गायन अनिवार्य कर दिया। इस व्यवस्था के विरोध में ब्रिटिश इंडिया सरकार यानी गोरी सरकार में कोलकाता के डिप्टी कलेक्टर बंकिमचंद चटर्जी ने कलम उठाई और 1870 में वंदे मातरम् को रच दिया।


आजादी के दीवानों ने वंदे मातरम् को गले लगाया

बंकिमचंद चटर्जी ने वंदे मातरम् गीत को अगले वर्ष अपने बहुचर्चित उपन्यास आनंदमठ का हिस्सा भी बना दिया। इसी दरम्यान वंदे मातरम् का उद्घोष अंग्रेजों को खटकने लगा है। गीत से नफरत का नतीजा यह हुआ कि स्वतंत्रता संग्राम में बंगाल से लेकर गुजरात और कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक क्रांतिकारियों ने वंदे मातरम् को अपना आधिकारिक जयघोष बना लिया। इस गीत के छंदों का उतार-चढ़ाव देशभक्ति के समंदर में ऐसी सुनामी पैदा करते थे कि कानपुर के वीरों ने अंग्रेज सरकार का झंडा उतारकर कानपुर को स्वतंत्र घोषित कर दिया था। ऐसा ही मेरठ, आगरा , झांसी में हुआ। इसके बाद इंग्लैंड के फरमान पर हिंदुस्तान में इस गीत को गुनगुनाने वालों पर जुल्म शुरु हो गए थे।


कोलकाता कांग्रेस अधिवेशन में पहली बार गूंजा वंदे मातरम्

यूं तो वंदे मातरम को पहली बार संगीतज्ञ यदुनाथ भट्टाचार्य ने राग और ताल में निबद्ध कर गाया था, लेकिन, 1896 के कांग्रेस के कोलकाता अधिवेशन में कवि रवींद्रनाथ नाथ टैगोर ने इसे सलीके से गुनगुनाया। मूल गीत के तीसरे पद में सप्त कोटि था, जिसे टैगोर ने कोटि कोटि कर दिया था। बंकिमचंद चटर्जी ने इस संशोधन को स्वीकार भी किया। कोलकाता अधिवेशन के बाद वंदेमातरम जनमानस में ऐसा गूंजा कि आजकक अमिट छाप है। वर्ष 1906 से 1911 तक बंग भंग के आंदोलन में संघर्ष में भी वंदे मातरम् अगुवा गीत था।


मूल गीत में पांच छंद , दो छंद को राष्ट्रगान की मान्यता

बंकिमचंद चटर्जी के मूल वंदे मातरम् में पांच छंद हैं, लेकिन राष्ट्रगान के रूप में गीत के शुरुआती दो छंद को मान्यता मिली है। यह दोनों छंद इस प्रकार हैं।

वन्दे मातरम् वंदे मातरम्....
सुजलाम् सुफलाम् मलयजशीतलाम् शस्यश्यामला मातरम् वन्दे मातरम्....
शुभ्रज्योत्स्नाम् पुलकितयामिनीम् फुल्लकुसुमित द्रुमदलशोभिनीम्
सुहासिनीम् सुमधुर भाषिणीम् सुखदाम् वरदाम् मातरम्
वन्दे मातरम् (प्रथम छंद)

सप्त-कोटि-कण्ठ-कल-कल-निनाद-कराले
द्विसप्त-कोटि-भुजैर्धृत-खरकरवाले,
अबला केन मा एत बले।
बहुबलधारिणीं नमामि तारिणीं रिपुदलवारिणीं मातरम्.... (द्वितीय छंद)


मूल गीत इस प्रकार है

बंकिमचंद चटर्जी ने वंदे मातरम् गीत में संस्कृति और बांग्ला भाषा का इस्तेमाल किया था। ऐसे में यदि बाँग्ला भाषा को ध्यान में रखा जाय तो इसका शीर्षक "बन्दे मातरम् होना चाहिये ‘वन्दे मातरम्‘ नहीं। चूँकि हिन्दी व संस्कृत भाषा में 'वन्दे' शब्द ही सही है, लेकिन यह गीत मूलरूप में बाँग्ला लिपि में लिखा गया था और चूँकि बाँग्ला लिपि में ‘व’ अक्षर नहीं है। ऐसे में बन्दे मातरम् शीर्षक से ही बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय ने इसे लिखा था। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए शीर्षक 'बन्दे मातर्म होना चाहिये था। बावजूद संस्कृत में 'बन्दे मातरम्’ का कोई शब्दार्थ नहीं है तथा "वन्दे मातरम्" उच्चारण करने से "माता की वन्दना करता हूँ" ऐसा अर्थ निकलता है, अत: देवनागरी लिपि में इसे वन्दे मातरम् ही लिखना व पढऩा उचित समझा गया। बहरहाल, मूल वंदे मातरम् गीत इस प्रकार है।

वन्दे मातरम् वंदे मातरम्....
सुजलाम् सुफलाम् मलयजशीतलाम् शस्यश्यामला मातरम् वन्दे मातरम्....
शुभ्रज्योत्स्नाम् पुलकितयामिनीम् फुल्लकुसुमित द्रुमदलशोभिनीम्
सुहासिनीम् सुमधुर भाषिणीम् सुखदाम् वरदाम् मातरम्
वन्दे मातरम् ॥ 1 ॥

सप्त-कोटि-कण्ठ-कल-कल-निनाद-कराले
द्विसप्त-कोटि-भुजैर्धृत-खरकरवाले,
अबला केन मा एत बले।
बहुबलधारिणीं नमामि तारिणीं रिपुदलवारिणीं मातरम्.. ॥ 2 ॥

तुमि विद्या, तुमि धर्म तुमि हृदि, तुमि मर्म त्वम् हि प्राणा: शरीरे
बाहुते तुमि मा शक्ति , हृदये तुमि मा भक्ति, तोमारई प्रतिमा गडी मन्दिरे-मंदिरे ॥ 3॥

त्वम् हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी कमला कमलदलविहारिणी वाणी विद्यादायिनी,
नमामि त्वाम् नमामि कमलाम् अमलां अतुलाम् सुजलां सुफलाम् मातरम् ॥4॥

वन्दे मातरम् श्यामलाम् सरलाम् सुस्मिताम् भूषिताम् धरणीं भरणीं मातरम् ॥ 5॥


वंदे मातरम् से जुड़े खास पहलू

सात नवंबर 1875 को बंकिम चंद्र चटर्जी ने गीत को रचा था

संस्कृत और बांग्ला मिश्रित है वंदेमातरम

सेव गॉड द क्वीन का विकल्प बना वंदेमातरम

आनंदमठ उपन्यास में शामिल है वंदेमातरम

संन्यासी विद्रोह की गाथा है आनंदमठ उपन्यास

यदुनाथ भट्टाचार्य ने इसे राग मल्हार और ताल कव्वाली में निबद्ध किया

कांग्रेस के 1896 में कोलकाता अधिवेशन में पहली बार रबींद्र नाथ टैगोर ने गाया

सात अगस्त 1905 के बंग भंग आंदोलन में जनमानस ने वंदेमातरम को नारे के रूप तब्दील किया
महात्मा गांधी ने कहा था कि जब तक यह राष्ट्र है, यह गीत अवश्य रहेगा

1937 में जवाहर लाल नेहरू की अध्यक्षता में गठित समिति जिसमें मौलाना अबुल कलाम आजाद भी शामिल थे, इस गीत के पहले दो पदों को राष्ट्र गीत के रूप में मान्य किया