
कानपुर. मुझे गुलामी नहीं, अंग्रेजों से आजादी चाहिए। प्यार से भारत छोड़ दो तो ठीक हैं, वरना हथियार के बल पर हम तुम्हें खदेड़ देंगे। यह शब्द बिठूर से 1857 में माराठा क्रांतिकारी नानाराव पेशवा ने अपने महल से अंग्रेज अफसरों से कहे थे, लेकिन नाना की धमकियों से गोरे नहीं डरे तो मराठा क्रांतिकारी ने आजादी का बिगुल फूंक दिया। कानपुर और आसपास के जिलों में क्रांति की आग जल उठी और घर-घर से आजादी के मतवाले निकल आए।
प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में विद्रोहियों ने अंग्रेजों को कुछ यूं पस्त कर दिया कि वह समझौते पर उतर आए। समझौते के तहत शहर में बाकी बचे अंग्रेज सैनिकों को कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) भेजने की तैयारी हुई। कोलकाता जाने के लिए गोरे गंगा तट पर सत्ती चौरा घाट पहुंचे। यहां पहले से ही दस हजार से अधिक लोगों की भीड़ अंग्रेजों का मान मर्दन देखने को मौजूद थी। इसी दौरान अंग्रेज अफसर सर व्हीलर की क्रूरता के किस्से भीड़ को तात्या के सिपाहियों ने सुना दिए। जिसके चलते भीड़ भड़क गई और करीब 450 बंदीयों ने अंग्रेजों को मौत के घाट उतार दिया। गोरों के खून से गंगा का जल लाल पड़ गया और यह घटना इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गई।
नाना से थर-थर कांपते थे गोरे
अंग्रेज सरकार की क्रूरता के चलते 1857 में मेरठ में विद्रोह की ज्वाला भड़की जिसकी आग कानपुर तक पहुंच गई थी। क्रांतिकारियों के लगातार हमले से अंग्रेजों ने कानपुर छोड़ने का फैसला कर लिया था। अंग्रेजों ने नाना के आगे हार स्वीकार कर समझौते पर उतर आए। समझौते के तहत शहर में बाकी बचे अंग्रेज सैनिकों सुरक्षित कलकत्ता निकलने के लिए सत्ती चौरा घाट पर 27 जून 1857 को 40 नावें मंगाई गई थी। अंग्रेज रवानगी के लिए पहुंचे तो वंदेमातरम के उद्घोष शुरू हो गए। इसी दौरान एक अंग्रेज सिपाही ने फायर कर दिया, जिसके चलते विद्रोही भड़क गया और जवाबी गोलीबारी में करीब 450 अंग्रेज मारे गए। इतिहासकार मनोज कपूर ने बताया कि नाना के खौफ से अंग्रेज थर-थर कांप रहे थे। अंग्रेजों ने इलाहाबाद से आर्मी को बुलावा पत्र भेजा। लेकिन वहां से फौज को आने में पद्रह से बीस दिन का समय लग जाता। इसी के चलते अंग्रेजों ने नाना के सामने सरेंडर कर कानपुर से कलकात्ता जाने को कहा। अंग्रेज सत्तीचौरा घाट पहुंचे और एक गलती के चलते सैकड़ों अंग्रेजों को जान गवांनी पड़ी।
नाना के सामने करना पड़ा सरेंडर
सत्तीचौरा कांड का शुरूआत अंग्रेज अफसर सर व्हीलर ने रखी थी। इतिहासकार मनोज कपूर बताते हैं सर व्हीलर ने नानाराव के किले पर कब्जा कर लिया था। जिसे मुक्त कराने के लिए नाना और उनके सौनिकों को धावा बोल दिया। 6 जून 1857 को प्रातः 10 बजे किले पर नाना साहब की तोप का पहला गोला गिरा । 6 से 26 जून तक किले पर नाना साहब की विशाल तोपें, जिन्हें वे नवाबगंज की मैगजीन से ले जाया करते थे, लगातार भयंकर गोलाबारी करती रहीं। नाना के सिपाहियों ने किले को चारो तरफ से घेर लिया और रसद का सामान रोक दिया। इसके चलते अंग्रेजों की कठिनाइयां दिन ब दिन बढ़ती जा रही थीं। किले के चारों ओर का घेरा दिन-प्रतिदिन कड़ा होता जा रहा था। 6 तारीख़ को अवध लोकल इन्फेंट्री की चौथी तथा पांचवीं पलटने भी जाकर नाना की फ़ौज में मिल गई। इन नई पलटनों ने आकर एक नये स्थान से अपनी तोपों द्वारा किले के भीतर उस स्थान पर गोले बरसाने आरंभ किये जहां कुआं था। किले के लोगों के लिए पानी प्राप्त करने का यही एकमात्र साधन था वह ध्वस्त हो गया। अंत में 25 जून को किले के अंदर से सफ़ेद झंडा लहरा कर जनरल व्हीलर ने अपने तमाम सैनिकों के साथ आत्म-समर्पण कर दिया। हार के बाद जनरल व्हीलर ने नाना साहब की शर्तें स्वीकार कर लीं और 27 तारीख़ को अंग्रेजों का किले से निकलकर गंगा के रास्ते इलाहाबाद जाना तय हुआ।
इसके चलते अंग्रेजों को गवानी पड़ी जानें
इतिहासकार ने बताया कि अंग्रेज सकुशल इलाहाबाद भेज दिये गये होते, लेकिन छठी देशी पलटन के इलाहाबाद से कानपुर आये सिपाहियों ने यहां के लोगों को नील के अत्याचारों के बारे में बताया क़ि किस प्रकार बाज़ार लूटे गये। गांव के गांव जला दिए गये। पुरुषों और बालकों को इन अंग्रेजों ने फांसी पर चढ़ा दिया। अंग्रेजों ने औरतों और बच्चियों से बलात्कार किये। ये ख़बर सुनते हीं आम जनसमूह और सिपाहियों का क्रोध चरम पर पहुंच गया।.जैसे ही फिरंगियों से भरी नाव चली, भीड़ में से किसी ने बिगुल बजा दिया, जिसे सुन कर मल्लाह नाव को छोड़ कर नदी में कूद पड़े। नावें डूबने लगीं।
अंग्रेजों ने मल्लाहों पर गोलियाँ चलायीं, जिसके जवाब में घाट पर तैनात सिपाहियों ने भी गोलियां चलायीं। सिपाही नावों पर भूखे भेड़ियों की तरह टूट पड़े। सारी नावों में कोलाहल मच गया। कोई तैरने लगा, कोई डूब गया तथा किसी को गोली लगी। गंगा भी रक्त से रक्तिम हो गयी। सिपाही इतने आक्रोशित हो गए थे क़ि दांतों से तलवार पकड़ कर तैर रहे थे और जहाँ उन्हें कोई शत्रु डूबता या तैरता हुआ मिलता तुरन्त उसके रक्त से अपनी तलवार रंग लेते थे। कुछ नावों में आग भी लग गयी और जो अंग्रेज इस से कूदे वो डूब कर मर गये। व्हीलर आदि अधिकतर सभी अंग्रेज मार डाले गये।
Published on:
24 Jan 2018 07:20 am
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