
कानपुर। लखनऊ के इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान में बुधवार से शुरू हुई दो दिवसीय इन्वेस्टर समिट से मजदूरों के शहर को बड़ी आस है। कानपुर से इस बैठक में शामिल होने के लिए करीब 128 उद्योगपति राजधानी गए हुए हैं, वहीं एल्गिन और लाल इंमली के कर्मचारी भी अपनी नजर सीएम योगी आदित्यनाथ पर लगाए हुए हैं। मजदूरों का कहना है कि हमें उम्मीद थी कि खुद पीएम व सीएम लाल इमली और एल्गिन को शुरू कराए जाने का ऐलान करेंगे, कि हमारे दिन बहुरेंगे, मिलों की मशीनों की आवाज से शहर सराबोर होगा, यहां का बना तौलया, चादर और बेड शीट अमेरिका और जपान के लोगों के घर पर दिखेंगे। पर ऐसा हुआ नहीं। दो दिनों तक सिर्फ नए कारखाने लगाए जाने पर जोर दिया गया।
तो अब नहीं शुरू होंगी मिलें
बुधवार को जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इन्वेस्टर समिट पर बोल रहे थे तो कानपुर मजदूर, यूथ सहित हजारों लोग टीवी पर नजर अड़ाए बैठे हुए थे। पीएम के संबोधन के बाद सीएम के साथ उद्योगपतियों की बैठक हुई। जिसके तहत करोड़ों के उद्योग लगाने जाने की रजामंदी उद्योगपतियों ने दी। समिट की बैठक गुरूवार को खत्म हो गई, जिसके बाद लोग चाय की दुकानों में चर्चा करते हुए देखे गए। कुछ ने कहा कि गुरू सब हवा-हवाई बाते हैं। कानपुर को चार साल में जब कुछ नहीं मिला तो एक साल के अंदर क्या पीएम नरेंद्र मोदी दे पाएंगे। वहीं दूसरे ने भी उसके हां में हां मिलाते हुए कहा कि चार साल से सुनते चले आ रहे हैं कि लाल इमली और एल्गिन जल्द चालू होने वाली है, पर ऐसा हुआ नहीं।
बोर्ड देखकर आंसू बहाते हैं मजदूर
मजदूर नेता मनोज सिंह कहते हैं कि अंग्रेजों के जमाने की एल्गिन को देश के नेताओं ने बंद करा दिया। 30 साल से ज्यादा समय गुजर गए पर एलिग्न की आवाज नहीं सुनाई दी। कहते हैं, उत्तर भारत का मैनेचेस्टर की पहचान दिलाने में प्रमुख भूमिका निभाने वाले एल्गिन मिल के बाहर अब सन्नाटा पसरा रहता है। गेट के बाहर मिल बंदी होने का नोटिस बोर्ड आज भी टंगा है जिसे मजदूर देख कर आंसू बहाते हैं। कभी इस मिल की बनी तौलिया लंदन की महारानी को खूब भाती थी। यहां का बना ज्यादातर माल लंदन एक्सपोर्ट होता था। लेकिन अब मिल एक खंडहर है, जिसके जीर्णोद्धार के लिए मजदूर समिट पर नजर लगाए थे। हमें उम्मीद थी कि कोई न कोई उद्योगपति से इसे शुरू कराए जाने का एलान करेगा, लेकिन एक भी धन्नासेठ एल्गिन के लिए खड़ा नहीं हुआ।
1864 में हुई थी एल्गिन की स्थापना
कभी एल्गिन मिल पर काम करने वाले 80 साल के मजदूर जुही निवासी रामरतन कुशवाहा ने बताया कि तीन दशक पहले मिलें बंद होनी शुरू हो गई। पहले एल्गिन फिर लाल इमली पर ताला पड़ गया। मजदूरों ने आवाज उठाई तो बंदूक के बल पर उकनी आवाज को बंद करा दिया गया। कुशवाहा बताते हैं कि 1864 में ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ के पिता एडवर्ड एल्गिन के नाम पर मिल की स्थापना की गई थी। यहां बनने वाली साठिया चद्दर, तौलिया, बेड शीट, 660 नंबर चादर, जींस का कपड़ा, लंकलाट के बने कपड़ों की तूती देश में ही नहीं बल्कि विदेश में भी बोलती थी। उस दौर की यहां बनी तौलिया और चद्दर को अंग्रेज लंदन लेकर जाते थे। 15 हजार से अधिक मजदूर काम करते थे। आजादी के बाद 11 जून 1981 को मिल का भारत सरकार ने अधिग्रहण कर लिया। सरकार ने इसे बीआईसी (ब्रिटिश इंडिया कॉर्पोरेशन) की सहायक कंपनी के तौर पर स्थापित कर दिया। 1982 तक यहां पर उत्पादन ठीक था। जब मिल में शिफ्ट बदली जाती थी तब मजदूरों का रेला निकलता था।
लोन बना बंदी का कारण
रामरतन कुशवाहा ने बताया कि ग्रीनपार्क छोर से लेकर नवाबगंज छोर की सड़कों पर चाय, खोमचों की दुकानें सजी रहती थीं। लंच के वक्त सैकड़ों मजदूर-कर्मचारी बाहर आकर दुकानों में बैठकर चाय का लुफ्त उठाया करते थे। लेकिन 1983 के बाद मिल की हालत खस्ता होती चली गई। तत्कालीन चेयरमैन ने मिल चलाने के लिए 9 बैंकों से करोड़ों का लोन लिया। लेकिन मिल चल नहीं पाई। यही लोन मिल बंदी का कारण बना। 1992 को मिल को बीमार घोषित कर दिया गया। 1994 से मिल बंदी की आधिकारिक घोषणा कर दी गई। 8 मई 2001 को अटल सरकार मिल में कर्मचारियों ने वीआरएस लेकर इस शर्त को माना कि जब मिल चलेगी तो उन्हें रोजगार दिया जाएगा। इसके बाद न तो मिल चली न रोजगार मिला।
Published on:
22 Feb 2018 10:35 pm
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