
कानपुर। आसमान में उमड़ते-घुमड़ते बादल और अचानक हुई प्री-मानसून बारिश ने किसानों के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। जहां एक ओर यह बारिश सूखी धरती को तर कर फसलों के लिए अनुकूल माहौल बनाती है, वहीं दूसरी ओर तेज आंधी, ओलावृष्टि और लगातार पानी किसानों की मेहनत पर पानी फेरने का खतरा भी बढ़ा देती है। खासकर मार्च-अप्रैल के इस दौर में, जब रबी की फसलें कटाई के लिए तैयार खड़ी होती हैं, तब यह बारिश किसी परीक्षा से कम नहीं होती। यह बात सीएसए मौसम विभाग के डॉ.एस.एन.सुनील पांडे का कहना है।
विशेषज्ञों के अनुसार इस समय गेहूं, सरसों और चना जैसी रबी फसलें पूरी तरह पककर कटाई के लिए तैयार रहती हैं। ऐसे में अचानक हुई तेज बारिश और ओलावृष्टि फसलों को खेतों में गिरा देती है। इससे दानों की गुणवत्ता प्रभावित होती है और कई बार दाने काले पड़ जाते हैं। गुणवत्ता खराब होने के कारण बाजार में फसल का उचित दाम नहीं मिल पाता। परिणामस्वरूप किसानों को भारी आर्थिक नुकसान झेलना पड़ता है और उनकी मेहनत पर प्रतिकूल असर पड़ता है।
वहीं आलू, प्याज और लहसुन जैसी जमीन के भीतर उगने वाली फसलों पर भी इस बारिश का खासा असर पड़ता है। खेतों में पानी भरने से इन फसलों के सड़ने का खतरा बढ़ जाता है, जिससे पूरी उपज खराब हो सकती है। फल उत्पादकों के लिए भी यह मौसम चुनौती बन जाता है। आम, लीची और नींबू जैसे फलों के पेड़ों पर लगे बौर और छोटे फल तेज हवा और बारिश के कारण झड़ जाते हैं, जिससे उत्पादन में भारी गिरावट आती है।
नमी बढ़ने से फसलों में फफूंद और कीटों का प्रकोप भी तेजी से फैलता है। इससे फसलें बीमार पड़ने लगती हैं और उनकी गुणवत्ता प्रभावित होती है। दूसरी ओर, भारी बारिश से खेतों की उपजाऊ ऊपरी मिट्टी बह जाती है, जिसे ‘मिट्टी का कटाव’ कहा जाता है। यह भविष्य की फसलों के लिए भी खतरा पैदा करता है। पशुपालकों के लिए भी यह समय जोखिम भरा होता है, क्योंकि आकाशीय बिजली गिरने से खुले में बंधे पशुओं की जान जाने का खतरा बना रहता है।
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Published on:
01 Apr 2026 09:20 pm
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