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राष्ट्रपति कोविद के घर के अदंर घुसा जहर, वर्ल्ड का सबसे प्रदूषित शहर कानपुर

विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट ने कानपुर को दिया दाग, पब्लिक खैफजदा तो अफसर हैरान

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विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट ने कानपुर को दिया दाग, पब्लिक खैफजदा तो अफसर हैरान

कानपुर। गंगा के किनारे बसा कानपुर कभी धार्मिक, आर्थिक और राजनीतिक नगरी के रूप् में पहचाना जाता था, लेकिन राजनीतिक उपेक्षा के चलते इसे धरातल पर धकेल दिया। 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी सरकार दिल्ली की सत्ता में आई तो एशिया के मैनचेस्टर के विकास की उम्मीद बढ़ी पर चार साल बीत जाने के बाद समस्या जस की तस बनी रही। 2017 में कानपुर के रहने वाले रामनाथ कोविंद देश के राष्ट्रपति पद के बैठे थे कानपुर हंस पड़ा और लगा कि जल्द ही चिमनियों से धुआं निकलेगा, लव-कुश की नगरी चमकेगी, गंगा निर्मल होगी और शहर से लोगों को प्रदूषण से मुक्ति मिलेगी। पर ऐसा हुआ नहीं, शहर जहां खड़ा था वहीं पर आज भी मौजूद है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट आने के बाद 40 लाख की आबादी दहशत में आ गई है। राष्ट्रपति का कानपुर वर्ल्ड का सबसे ज्यादा प्रदूषित शहरों की लिस्ट में पहले स्थान पर पहुंच गया है।
शपथ के बाद भी नहीं चेता सरकारी महकमा
स्वच्छता अभियान का आरंभ करने के लिए बिते दिनों देश के राष्ट्रपति कानपुर के बिठूर स्थित एक गांव में आए थे। यहां उन्होंने लोगों को पर्यावरण के साथ स्वच्छता की शपथ दिलाई थी। इस अवसर पर यूपी के सीएम के साथ उनके मंत्रिमंडल के अधिकतर मंत्री और पूरा प्रशासनिक अमला मौजूद था। बावजूद सरकारी महकमे ने राष्ट्रपति की दिलाई शपथ पर अमल नहीं किया और बुधवार को विश्व स्वास्थ्य संगठन ने वायु प्रदूषण को लेकर जो सूची जारी की है उसमें कानपुर वर्ल्ड के सबो प्रदूषित शहरों की श्रृणी में नंबर एक की पायदान पर है। यह शासन-प्रशासन के साथ की कानपुर के जनप्रतिनिधियों के साथ ही राष्ट्रपति ीरमनाथ कोविंद के लिए किसी झटके से कम नहीं। सूची में वायु प्रदूषण को लेकर कानपुर पहले स्थान पर है। डब्ल्यूएचओ के आंकड़ों के अनुसार विश्व के 15 सबसे प्रदूषित शहरों की सूची जारी की है जिसमे भारत के 14 शहर शामिल है। कानपुर सबसे प्रदूषित शहर है जबकि उसके बाद फरीदाबाद का नम्बर आता है और फिर काशी को स्थान दिया गया है।
तो अफसर कागजी घोड़े दौड़ाते रहे
शहर की यह स्थिति तब है जब कानपुर से पढ़ लिखकर रामनाथ कोविंद देश की सियासत में छाए और 2017 में वह राष्ट्रपति के लिए चुने गए। राष्ट्रपति चुने जाने के बाद रामनाथ कोविंद कानपुर आए और उन्होंने शहर को हरा-भरा रखने के लिए शासन, प्रशासन, जनप्रतिनिधियों के साथ कानपुर के लोगों से अपील की, पर उनकी बातों पर अहम नहीं किया। खुद सीएम बिठूर महोत्सव के दौरान कानपुर के कई स्थलों को पर्यटन क्षेत्र के रूप में विकसित करने के साथ ही देश और विदेश से बड़े पैमाने पर उ़द्योगपतियों के लाने की घोषणा की थी। प्रदूषण को जड़ से खत्म करने के लिए आईआईटी की मदद मांगी, लेकिन नतीजा सिफर रहा। प्रदूषण रूपी जहर से पूरा शहर हांफ रहा। प्रदूषण के चलते सैकड़ों की संख्या में लोग गंभीर बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं। हरे-भरे पेड़-पौधे मुरझा रहे हैं।
खुली हवा में सांस लेना कठिन
यहां पर विकास के नाम पर हुए मजाक की कीमत लोगों को चुकानी पड़ रही है। शहर की आधी हरियाली को खत्म कर दिया गया। इसके बाद भूमिगत बिजली के तार, गैस पाइप लाइन व सीवर के लिए खोदे गये गड्ढ़ों के चलते शहर में इतनी धुल उड़ती है कि खुली हवा में सांस लेना कठिन हो गया है। विकास समय की मांग है लेकिन विकास कार्यों की मानीटरिंग नहीं होने से स्थिति इतनी खराब हुई है। सड़क पर गड्ढा खोद कर छोड़ दिया जाता है और धुल उड़ती रहती है लेकिन शहर के किसी अधिकारी को इस बात मतलब नहीं होता है कि उड़ती धुल से लोगों के फेफड़े झलनी हो रहे हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट ने खतरे की घंटी बजा दी है यदि अभी भी जिला प्रशासन वायु प्रदूषण को लेकर सख्त नहीं हुआ तो आने वाले समय में खुली हवा में सांस लेना ही कठिन हो जायेगा। वहीं विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के बाद सरकारी व गैर सरकारी विभाग के अधिकारीयों में हड़कंप मचा हुआ है। हालात ऐसे हो गए हैं कि जो अधिकारी स्वछता के मामले में कानपुर को अव्वल नंबर का गुणगान किया करते थे, लेकिन अब गोलमोल जवाब देने में लगे हैं।
2016 की रिपोर्ट के बाद भी नहीं जागा प्रशासन
विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट 2016 में आई थ्सी। संगठन के सर्वे करने वाले अधिकारीयों ने कानपुर को सबसे प्रदूषित शहर घोषित कर दिया था। लेकिन रिपोर्ट का खुलासा के साथ कानपुर को काले जहर से बचाने के लिए प्रयास भी नहीं किए गए। पत्रिका टीम ने जब कानपुर को ओडीएफ मुक्त कराने के साथ ही यूपी का सबसे स्वच्छ जिला घोषित करने के बाद सीएम के पुरूस्कार से नवाजे गए नगर आयुक्त अविनाश सिंह से जब इस बारे में बातचीत की गई तो उन्होंने खुलकर बोलने के बजाए गोलमोज जवाब दिया। रिपोर्ट आने के बाद जिले में तैनात कमिश्नर, डीएम, सीडीओ के साथ ही सबसे जिम्मेदार नगर निगम विभाग के अधिकारी चुप्पी साध चुके हैं। मामले पर नगर आयुक्त ने कहा कि इस बारे में हमारे पास आधिकारिक पुष्टि नहीं आई और न ही हमने अभी रिपोर्ट देखी। रिपोर्ट देखने के बाद ही कुछ कहा जा सकता है। मामले पर आरटीओ आदित्य त्रिपाठी ने भी रिपोर्ट नहीं देखने का हवाला देखकर बच निकले।