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कासगंज। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) में हर कोई स्वयंसेवक है। सबको गर्व होता है कि वह साधारण स्वयंसेवक है। साधारण स्वयंसेवक के मायने क्या होते हैं, इस बारे में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर ‘गुरुजी’ ने विस्तार से प्रकाश डाला है। उन्हीं के संभाषण का एक अंश राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बृज प्रांत प्रचार प्रमुख केशवदेव शर्मा ने पत्रिका को भेजा है।
असामान्यता क्या
अब यह जो ‘साधारण स्वयंसेवक’ शब्द-प्रयोग है, वह तो अच्छा है, क्योंकि हम सभी साधारण स्वयंसेवक हैं। असाधारण किसमें है ? अब लोग कहते हैं कि मेरा संघ में प्रमुख स्थान है। अंग्रेजी में चीफ ऑफ आर.एस.एस. (Chief of R.S.S) कहते हैं। तो मुझमें असाधारणता या असामान्यता कौन सी है ? थोड़ी दाढ़ी बढ़ी है, आप भी नित्य दाढ़ी न बनायें तो आपकी भी बढ़ेगी। उसमें असामान्यता क्या है ? यहाँ पर भी कुछ ऐसे लोग हैं जो उस दिशा में प्रयत्नशील हैं। इसलिए उसमे कोई विशेषता नहीं है।
साधारण स्वयंसेवक’ होना अत्यन्त प्रतिष्ठा की बात
मुझे बहुत पुराना स्मरण है। वह है अपने संघ का कार्य, जिन्होंने आरम्भ किया उनके बारे में। उन्होंने अपने सहयोगी कार्यकर्ता बन्धुओं से आग्रहपूर्वक कहा – ‘‘यह जो सरसंघचालक का काम है, उसे करने के लिए किसी अन्य को तैयार करो जिससे मैं उसे यह दायित्व सौंप कर एक ‘साधारण स्वयंसेवक’ के रूप में खुल कर काम कर सकूंगा। साधारण स्वयंसेवक कैसा हो, इस सम्बन्ध में मेरी कुछ धारणा, इच्छा, अपेक्षा है। तनुसार स्वयं चलकर अपने साथ-साथ काम करने वालों के सामने एक उदाहरण प्रस्तुत किया जा सकेगा।’’ अर्थात् उनकी कल्पना ‘साधारण स्वयंसेवक’ बन कर रहने की थी। परिस्थिति ने उन्हें वैसे रहने नहीं दिया, अत: संघ के प्रमुख के नाते उन्हें काम करना पड़ा। उन्होंने ऐसी इच्छा मन में क्यों की ? ऐसी अपेक्षा क्यों रखी ? एकमात्र कारण है कि अपने संगठन में ‘साधारण स्वयंसेवक’ होना अत्यन्त प्रतिष्ठा की बात है। अत्यधिक प्रतिष्ठा की।
संघ का स्वयंसेवक होना गर्व की बात
समय-समय पर अपने देश में, समाज में घूमते हुए यदि कोई मुझे पूछे कि ‘तुम्हारे जीवन में सर्वाधिक गर्व करने योग्य कौन सी बात तुम्हें लगती है?’ तो मैं कहना चाहूँगा कि ‘मैं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का स्वयंसेवक हूँ’। इससे अधिक गर्व करने योग्य कोई बात नहीं है। हाँ, कुछ पढ़ लिया, कुल उपाधियां मिलीं, कुछ लोगों को पढ़ाया भी, कहीं-कहीं जाकर भाषण करता हूँ, कुछ लोग आकर माला पहनाते हैं, कुछ साष्टांग दण्डवत् प्रणाम भी करते हैं। मेरे इस रूप और वेश के कारण मुझे अधिक लोग नमस्कार करते हैं, तो उसमें भी मुझे गौरव नहीं अनुभव होता। बड़े-बड़े लोग मिलते हैं, बाहर के भी मिलते हैं,धार्मिक क्षेत्र के श्रेष्ठ साधु पुरुष मिलते हैं। हम लोगों पर उनकी कृपा है। राजनीति के क्षेत्र के मिलते हैं, शिक्षा-क्षेत्र वाले मिलते हैं, विभिन्न समस्याएँ सामने रखते हैं और कहते हैं कि हमें परामर्श दीजिये। ये सब बातें मन में एक प्रकार से अभिमान उत्पन्न करने वाली अवश्य हैं। परन्तु मुझे कभी ऐसा नहीं लगा कि इस पर कोई गर्व किया जाये। गर्व करने की यदि कोई बात ही तो यही है कि ‘ईश्वरीय संकेत और संयोग से मैं अपने संघ का स्वयंसेवक हूं।
Published on:
25 Nov 2018 07:44 am
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